सात कर सात घाव : आजादी की अनसुनी कहानी

कोल विद्रोह (कोल विद्रोह या कोल बगावत) छोटानागपुर पठार क्षेत्र (आज का झारखंड, भारत) में कोल जनजाति (मुंडा, ओरांव, हो और भूमिज सहित) का एक बड़ा आदिवासी विद्रोह था।

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11/20/20251 min read

कोल विद्रोह (कोल विद्रोह या कोल बगावत) छोटानागपुर पठार क्षेत्र (आज का झारखंड, भारत) में कोल जनजाति (मुंडा, ओरांव, हो और भूमिज सहित) का एक बड़ा आदिवासी विद्रोह था। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ था। यह 1831 के अंत में शुरू हुआ और 1832 के मध्य तक ब्रिटिश अधिकारी थॉमस विल्किंसन के नेतृत्व में सैन्य बल द्वारा दबा दिया गया।

कोल विद्रोह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह हो , मुंडा आदि आदिवासियों की स्वतंत्रता की भावना और जनजातीय विशिष्टता पर बढ़ते हमलों के विरुद्ध लंबे समय से पनप रहे असंतोष का परिणाम था। विद्रोह का मुख्य कारण गैर-आदिवासी बाहरी लोग (सिख, मुस्लिम और हिंदू) थे जो सूदखोर, जमींदार और कर ठेकेदार (ठेकेदार) बनकर आए। इन्होंने आदिवासी समुदायों को उनकी जमीन से बेदखल किया, कर्ज के जाल में फंसाया और कठोर आर्थिक बोझ डाला। इससे विद्रोहियों ने लूटपाट, आगजनी और छापामार युद्ध शुरू किया, पहले बाहरी लोगों को निशाना बनाया, फिर ब्रिटिश सैनिकों से भिड़े।

यद्यपि विद्रोह का विस्फोट आदिवासियों द्वारा अपने उत्पीड़कों के विरुद्ध की गई जवाबी कार्रवाइयों से हुआ, इन कार्रवाइयों की जड़ औपनिवेशिक प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों द्वारा लगाए गए सात घृणित करों और अन्य वसूलियों में गहराई से जुडी हुई थी। ये नए आर्थिक बोझ हो , मुंडा आदि आदिवासियों के पारंपरिक जीवन और स्वायत्तता पर एक सीधा और असहनीय प्रहार थे।

इन सात करो के प्रतिशोध में आदिवासियों ने भी विद्रोह के दौरान दिकुओं , साहूकारों , सिख और मुस्लिम ठेकेदारो या स्थानीय एजेंटो के शरीर पर सात घाव के निशान बनाने थे । ये कोई मानसिक विकृति नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक प्रतिशोध था। सात घाव का प्रतिशोध बताता है की हो , मुंडा आदि आदिवासी किस हद तक अंग्रेजी कानून और उनके चाटुकार जमींदारों और एजेंटो के साथ दिकुओं से परेशान थे। प्रत्येक घाव सात घृणित करों का प्रतिनिधित्व करता था।

आदिवासियों पर लगाए गए ये "सात कर " नए आर्थिक बोझ की एक श्रृंखला थी जिसने उनके पारंपरिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया और उन्हें अत्यंत अन्यायपूर्ण माना गया। इन करों ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर किया, बल्कि उनकी सांस्कृतिक प्रथाओं और सामाजिक ताने-बाने को भी निशाना बनाया।

प्रत्येक कर का विस्तृत विश्लेषण

1. बट्टा प्रणाली: तांबे को चांदी में बदलने पर लगने वाला शुल्क

बट्टा प्रणाली तांबे के सिक्कों को चांदी में बदलने पर लगाया जाने वाला एक शुल्क था। यह हो आदिवासीयो पर एक महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ था, जिसे "तांबे की मुद्रा का हेरफेर" (Manipulation of the copper currency) के रूप में वर्णित किया गया है। चूंकि कोल लोगों का अधिकांश दैनिक लेन-देन छोटे मूल्य के तांबे के सिक्कों में होता था, इसलिए उन्हें आधिकारिक या बड़े भुगतानों के लिए चांदी में बदलने पर एक अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती थी। यह प्रथा उनके वित्तीय संसाधनों पर एक और कटौती थी, जिसने पहले से ही शोषित आबादी पर आर्थिक बोझ को और बढ़ा दिया।

2. पतचुइ कर: हंड़िया पर उत्पाद शुल्क

यह कर हो आदिवासीयो के लिए सबसे अधिक कष्टदायक था, क्योंकि यह हंड़िया (चावल से बनी बीयर) पर लगाया गया था, जिसे उनके लिए "जीवन की एक आवश्यकता" माना जाता था। हड़िया आदिवासियों के लिए सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण थी। उनके पूजा - पाठ से लेकर सार्वजनिक समारोहों में भी इसका प्रयोग होता है। ऐसे में हड़िया पर कर आदिवासियों के संस्कृति और धर्म पर हमला माना जाने लगा। कर ने इसे बाहरी लोगों के लिए लाभ का साधन बना दिया, जबकि स्थानीय लोगों को भुगतान न करने पर सजा दी जाती थी।

1830 में कथबर्ट द्वारा इस कर को फिर से लागू किया गया, जो शराब के निर्माण और बिक्री पर एक प्रकार का गृह-कर था। इससे पहले घर में हड़िया बनाने पर अब तक किसी भी ज़मींदार ने ऐसा कर नहीं लगाया था", इसलिए इसे ब्रिटिश शासन द्वारा थोपी गई एक अभूतपूर्व नाइंसाफी के रूप में देखा गया।

3. अफीम पर प्रस्तावित कर और अनिवार्य खेती

औपनिवेशिक प्रशासन की "नई अफीम नीति" ने अशांति को और भड़काया। कथबर्ट द्वारा अफीम की अनिवार्य खेती की एक प्रणाली शुरू की गई, जबकि हो आदिवासीयो को इसकी प्रसंस्करण प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ज़मींदारों, जागीरदारों और पुलिस अधिकारियों ने इस खेती को लागू करने के लिए जबरदस्ती के उपायों का इस्तेमाल किया। कंपनी द्वारा दी जाने वाली कीमत (3 रुपये 8 आना प्रति सेर) अत्यधिक कम थी, जो गंभीर आर्थिक शोषण का एक स्पष्ट उदाहरण था। इस नीति की कठोरता इतनी स्पष्ट थी कि संयुक्त आयुक्तों की रिपोर्टों ने इसे "नापसंद" किया और नवंबर 1832 में छोटा नागपुर में इसे "बंद करने का आदेश दिया गया"। इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रशासन के भीतर भी कुछ लोगों ने इसे एक विनाशकारी नीति के रूप में पहचाना।

4. गुनहगारी कर : कथित या वास्तविक अपराधों के लिए जुर्माना

यह नाज़िर और दारोगा जैसे अधिकारियों द्वारा लगाए गए मनमाने जुर्माने से संबंधित थी, जिसे गुनहगारी कर कहा जाता था। ये जुर्माना अक्सर वास्तविक या काल्पनिक अपराधों के लिए लगाया जाता था, जिससे स्थानीय अधिकारियों को जबरन वसूली करने का एक शक्तिशाली साधन मिल गया। इस प्रणाली ने मनमानी न्याय की एक व्यवस्था बनाई, जिससे आदिवासियों में भय और असहाय की भावना पैदा हुई। सदरलैंड के अनुसार, यह शायद वह व्यवस्था थी "जिससे लोगों को सबसे अधिक पीड़ा हुई"। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें ग्रामीणों के पास रिश्वत देने के अलावा कोई चारा नहीं होता था, जिससे उनका और अधिक शोषण होता था।

5. ग्राम सलामी

"ग्राम सलामी" एक और जबरन वसूली थी। इसके तहत प्रत्येक गाँव से "प्रति वर्ष 1 रुपये का सलामी " वसूल किया जाता था। यह कोई औपचारिक कर नहीं था, बल्कि एक प्रकार की जबरन वसूली थी जो अधिकारियों के प्रति ग्रामीणों की अधीनता को सुदृढ़ करती थी। यह प्रथा इस बात का प्रतीक थी कि कैसे स्थानीय प्रशासन नियमित रूप से छोटे-छोटे तरीकों से गाँवों के संसाधनों का दोहन करता था, जिससे आदिवासियों की आर्थिक कठिनाइयाँ और बढ़ जाती थीं।

6. बेगार : सड़कों पर बेगार (जबरन श्रम)

आदिवासीयो को सड़कों पर बिना किसी पारिश्रमिक के जबरन श्रम (बेगार) करने के लिए मजबूर किया जाता था। यह उत्पीड़न का एक महत्वपूर्ण रूप था, लेकिन इसका दायरा केवल सड़क निर्माण तक ही सीमित नहीं था। जबरन श्रम ने उनके कृषि चक्र को सीधे तौर पर पंगु बना दिया, क्योंकि उनसे "तीन दिन की जुताई, तीन दिन का कुदाल का काम, तीन दिन का रोपण और इसी तरह" काम करवाया जाता था। लोगों को उनके अपने कृषि कार्यों से दूर ले जाया जाता था, जिससे उनकी खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता सीधे तौर पर प्रभावित होती थी। यह प्रथा उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का घोर उल्लंघन थी।

7. डाक कर: गांवों पर डाक शुल्क

डाक-संग्रह के तहत, संचार मार्गों को बनाए रखने के लिए कुछ गाँवों से 4 रुपये का शुल्क लिया जाता था। सदरलैंड के अनुसार, यह कर सरकार द्वारा स्वीकृत था, लेकिन आदिवासीयो ने इसे एक अनुचित बोझ के रूप में देखा। यह स्थानीय आबादी पर औपनिवेशिक प्रशासन की लागत थोपने का एक और उदाहरण था, जबकि उन्हें इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल रहा था। यह उनकी भूमि पर बाहरी शासन के बुनियादी ढांचे को वित्तपोषित करने के लिए मजबूर किए जाने को दर्शाता था।

निष्कर्ष: उत्पीड़न का सामूहिक बोझ

संक्षेप में, जबकि प्रत्येक कर अपने आप में एक महत्वपूर्ण शिकायत थी, उनके सामूहिक भार ने एक असहनीय स्थिति पैदा कर दी जिसने विद्रोह को अनिवार्य बना दिया। ये सात घृणित कर अलग-अलग मुद्दे नहीं थे, बल्कि कोल लोगों की आर्थिक स्थिरता, सांस्कृतिक प्रथाओं और गरिमा पर एक व्यवस्थित हमले का हिस्सा थे। जैसा कि सदरलैंड ने उल्लेख किया है, "इस प्रकृति के सभी कर कोलों के लिए असहनीय थे"। बट्टा, आबकारी, अनिवार्य अफीम की खेती, गुनहगारी, सलामी, बेगार और डाक कर के संयुक्त प्रभाव ने इन शोषणकारी उपायों को इस हद तक बढ़ा दिया कि उन्होंने "ब्रिटिश शासन को घृणित बना दिया"। अंततः, उत्पीड़न के इसी सामूहिक बोझ ने उन्हें "न्याय को अपने हाथों में लेने के हताश संकल्प" की ओर धकेल दिया, जिसके परिणामस्वरूप कोल विद्रोह हुआ। यह विद्रोह शोषण के उस बोझ के खिलाफ एक शक्तिशाली प्रतिक्रिया थी जिसे वे अब और सहन करने को तैयार नहीं ये कर, 1793 के स्थायी बंदोबस्त और नमक जैसे आवश्यक वस्तुओं पर व्यापार प्रतिबंधों के साथ मिलकर शोषण की हद पार कर दिया। इसी के विरुद्ध में सिंगराई मुंडा , बिंदराई मुंडा , बुद्धू भगत जैसे नेताओं ने हजारों लोगों को छापामार हमलों के लिए एकजुट किया, लेकिन विद्रोह भारी जन हानि के साथ खत्म हुआ—1,000 से अधिक विद्रोही मारे गए। इसी दौरान आदिवासियों ने प्रतिशोध के लिए प्रतीकात्मक रूप अपनाया और पकड़े गए दिकुओं , जमींदारों , सिपाहियों आदि को सात करो के दर्द को समझने के लिए सात घाव शरीर में देने लगे। यह आंदोलन झारखंड में सबसे अधिक मौतों वाला आंदोलन माना जाता है। इस आंदोलन ने आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच की खाई और गहरी कर दी।

कोल विद्रोह ने आदिवासी सामुदायिक भूमि प्रणाली और ब्रिटिश राजस्व नीतियों के टकराव को उजागर किया। इसने बाद के आदिवासी आंदोलनों जैसे मुंडा उलगुलान (1899–1900) को प्रेरित किया। इसने ठेकेदारों के दुरुपयोग की जांच जैसे छोटे सुधार लाए, लेकिन व्यवस्थित शोषण स्वतंत्रता तक जारी रहा।