सारंडा : प्राकृतिक सौंदर्य का आवास एवं संरक्षण का प्रयास

सारंडा जंगल प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार हैं। इसकी भव्यता, मनमोहक आकर्षण और वैभव मन को मंत्रमुग्ध कर देता है।

INDEGENOUS

11/20/20251 min read

सारंडा जंगल प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार हैं। इसकी भव्यता, मनमोहक आकर्षण और वैभव मन को मंत्रमुग्ध कर देता है। प्रकृति प्रेमियों को प्रकृति की प्रचुरता और समृद्ध जैव विविधता से युक्त साल के वृक्षों के इस साम्राज्य को देखने का अवसर प्राप्त करने महत्वपूर्ण अवसर हो सकता।

यहाँ का भूभाग 200 मीटर से लेकर 900 मीटर तक ऊँची चोटियों से भरा है। इस पहाड़ी श्रृंखला का सबसे ऊँचा बिंदु 927 मीटर ऊँचा है। सारंडा दो विशाल लौह अयस्क परियोजनाओं, किरीबुरू परियोजना और मेघाहातुबुरू परियोजना का केंद्र है।

सारंडा नामकरण

1. सारंडा का नाम उत्पत्ति के आधार है। इसमें दो महत्वपूर्ण है

2. सात सौ पहाड़ियों का स्थल - क्योकि यहाँ कई पहाड़िया है , सारंडा शब्द यहाँ पाए जाने वाले सांभर और प्राकृतिक जल स्रोतों के नाम पर पड़ा। सारम अर्थात सांभर और दा का अर्थ है पानी।

पर्यटन स्थल

सारंडा गढ़ - यहाँ एक किला है माना जाता है की वो इतिहास में छुपे किसी राजा का गढ़ है। पास में दो लोहे के नगाड़े भी है। राजा उन्हें बजवा कर अपने प्रजा को बुलाते थे।

तायोबो जल प्रपात : यह जलप्रपात अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आसपास की जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है।

पंचेरी जल प्रपात सारंडा : पंचेरी जलप्रपात (Pancheri Falls) सारंडा के घने जंगलों में स्थित है और यह झारखंड के कोल्हान एस्टेट क्षेत्र का एक हिस्सा है। यह झरना सारंडा वन के भीतर एक छिपा हुआ रत्न माना जाता है, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है।

झिंगरा जलप्रपात (Jhingra Fall या Jhikra Fall): सरांडा वन के हृदय में स्थित एक मनोरम जलप्रपात है, जो किरीबुरू (Kiriburu) शहर के पास पंप हाउस के निकट बहता है। यह क्षेत्र हाथियों का जंगल (किरि=हाथी, बुरु=जंगल) के नाम से जाना जाता है और लौह अयस्क खदानों के लिए प्रसिद्ध है।

झाटी सिरिंग जलप्रपात: सरांडा वन के घने साल के जंगलों में छिपा एक मौसमी जलप्रपात है, जो किरीबुरू के पास स्थित है। यह क्षेत्र "सात सौ पहाड़ियों की भूमि" के नाम से जाना जाता है और प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

सनराइज पॉइंट और सनसेट पॉइंट : सरांडा वन के ऊंचे पहाड़ियों पर स्थित एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो किरीबुरू (Kiriburu) और मेघाहातूबुरू (Meghahatuburu) क्षेत्र में है। यह एशिया के सबसे बड़े साल के जंगलों के बीच सूर्योदय - सूर्यास्त का मनोरम दृश्य प्रदान करता है, जहां कोहरे से ढकी पहाड़ियां और हरी-भरी वादियां सुनहरी किरणों से नहा जाती हैं।

थलकोबाद : यह झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में सारंडा जंगल के भीतर स्थित एक गाँव है, जो लगभग \(550\) मीटर (1,800 फीट) की ऊंचाई पर बसा है। यह चक्रधरपुर से लगभग \(89\) किमी और जमशेदपुर से लगभग \(160\) किमी दूर है और अपने वन विश्राम गृह के लिए जाना जाता है। यह जगह घने जंगल, प्राचीन रहस्यों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। यह एक सुंदर गाँव है जो सारंडा जंगल का हिस्सा है और अपने वन विश्राम गृह के लिए जाना जाता है, जो पर्यटकों को प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने के लिए आकर्षित करता है।

सारंडा वन, भारत के झारखंड में एक छिपा हुआ रत्न है:

1. एशिया का सबसे बड़ा साल वन: सारंडा एशिया के सबसे बड़े साल वन के रूप में प्रसिद्ध है, जो साल वृक्षों की घनी छतरी के लिए जाना जाता है।

2. जैव विविधता हॉटस्पॉट: यह जंगल विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीवों का घर है, जिनमें उड़ने वाली छिपकली जैसी लुप्तप्राय प्रजातियां भी शामिल हैं।

3. जनजातीय विरासत: सारंडा में विभिन्न जनजातीय समुदाय निवास करते हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएं और भाषाएं हैं।

4. साहसिक गतिविधियाँ: ट्रैकिंग और कैम्पिंग से लेकर वन्यजीव सफारी और पक्षी दर्शन तक, सारंडा विभिन्न प्रकार की आउटडोर गतिविधियाँ प्रदान करता है।

5. प्राकृतिक सौंदर्य: इस जंगल में घुमावदार पहाड़ियां, गिरते झरने और मनमोहक दृश्य हैं।

6. यात्रा का सर्वोत्तम समय: सारंडा की यात्रा के लिए आदर्श समय अक्टूबर और मार्च के बीच है जब मौसम सुहावना होता है।

7. सांस्कृतिक अनुभव: स्थानीय जनजातीय समुदायों के साथ बातचीत करें, उनकी परंपराओं के बारे में जानें, और उनके नृत्य और अनुष्ठानों को देखें।

सारंडा के हरे-भरे जंगलों में, जहाँ सात सौ पहाड़ियाँ प्रकृति का अनुपम सौंदर्य बिखेरती हैं, लगभग 80% आबादी मुंडा, उराँव और अन्य प्राचीन आदिवासी समुदायों से संबंधित है। ये जनजातियाँ न केवल यहाँ की निवासी हैं, बल्कि जंगलों की संरक्षक भी हैं, जो उनकी आजीविका का आधार हैं। प्रत्येक घर जंगल के खजाने पर निर्भर है—शहद, मशरूम, महुआ के फूल और बीज, साल के पत्ते, औषधीय पौधे, लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, बल्लियाँ, छप्पर, लाख उत्पादन के लिए कुसुम और पलास, हरी खाद, दातुन, इमली और तरह-तरह के जंगली फल। ये वन उत्पाद केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

इस क्षेत्र की नदियाँ और धाराएँ, जो जंगलों से निकलती हैं, गाँवों की कृषि गतिविधियों के लिए जीवन रेखा हैं। ये जलस्रोत खेतों को सींचते हैं और समुदायों को जोड़ते हैं।

जंगल के साथ सांस्कृतिक रिश्ता

सदियों से ये जनजातियाँ जंगलों के बीच बसी हैं। उनके रीति-रिवाज, त्यौहार और संस्कृति जंगल के इर्द-गिर्द बुनी गई है। साल और करम जैसे पेड़ों की पूजा यहाँ की परंपरा का हिस्सा है, और वन्यजीवों की रक्षा उनकी संस्कृति में गहराई से समाई है। प्रत्येक आदिवासी गाँव में 2-5 एकड़ का एक पवित्र उपवन, जिसे 'सरना' कहते हैं, होता है। यह स्थान न केवल आध्यात्मिक, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

सारंडा, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव-विविधता के कारण, इको-टूरिज्म का एक उभरता हुआ केंद्र बन सकता है, जो स्थानीय लोगों के लिए आजीविका का नया स्रोत हो सकता है।

जल संसाधनों का महत्व

इस क्षेत्र की जल निकासी प्रणाली मुख्य रूप से उत्तर की ओर दक्षिण कोयल नदी में प्रवाहित होती है। प्रमुख नदियाँ— कारो, कोइना, लिलोर , तेतरी , समता, कालिया और पितिदिरी —पूर्व से पश्चिम तक बहती हैं। कारो, सबसे बड़ी और बारहमासी नदी है । कोइना, इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण नदी, बोनाल सीमा पर भनगांव के ऊपर दक्षिण में उद्गमित होती है। यह जंगलों के बीच लगभग पचास मील तक बहती है और मोहनपुर में दक्षिण कोयल में मिल जाती है। इस जलग्रहण क्षेत्र में 304.80 वर्ग किमी आरक्षित वन हैं।

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले और ओडिशा के कुछ हिस्सों में फैले लाखों लोग इन नदियों से लाभान्वित होते हैं। ये जलस्रोत न केवल कृषि, बल्कि समुदायों की सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी मजबूती देते हैं।

सारंडा के जंगलों की जैविक समृद्धि: प्रकृति का अनमोल खजाना

सारंडा के घने जंगल जैव-विविधता का एक अनुपम नमूना हैं, जो डेंड्रोबियम वंश की सभी 11 प्रजातियों सहित ऑर्किड की प्रजातियों के लिए एक अनूठा आवास प्रदान करते हैं। 550 मीटर की ऊँचाई पर स्थित थोलकोबाद क्षेत्र ऑर्किड प्रजातियों, विशेष रूप से बल्बोफाइलम क्रैसिपेस, एक एपिफाइटिक ऑर्किड की अंतिम शेष आबादी का घर है। पेक्टेलिस्ट्रिफ्लोरा, जो भारत में केवल दो स्थानों—सारंडा के जंगलों और उत्तराखंड की टोंस घाटी में पाया जाता है, किरीबुरु समूह में मौजूद है। यह प्रजाति और बल्बोफाइलम क्रैसिपेस केवल सारंडा तक ही सीमित हैं, जो इस क्षेत्र की अनन्य जैविक विरासत को दर्शाता है।

थोलकोबाद का लिगार्डा दलदल: वनस्पतियों का अनोखा संसार

थोलकोबाद का लिगार्डा दलदली क्षेत्र अपनी विशिष्ट वनस्पतियों के लिए विख्यात है। यहाँ ज़िंगिबरेसी परिवार के पौधे जैसे हेडीकियम कोरोनारियम, सेज, और घास की प्रजातियाँ प्रमुख हैं। यह दलदल इतना गहरा है कि विशाल जंगली हाथी भी इसमें समा सकते हैं, और इसे घने साल के जंगलों ने चारों ओर से घेर रखा है। यहाँ लिकुआला पेल्टाटा और कैलमस विमिनलिस जैसे ताड़ के पेड़, जंगली केले की प्रजातियाँ जैसे मूसा ऑर्नेट और मूसा सेपिएंटम, साथ ही यूजेनिया ऑपरकुलाटा, लासिया हेटरोफिला, एमोमम डीलबेटम, ज़िंगिबेरारोसियम, कर्कुलिगोरेकर्वता, केरेक्सफाओटा और कई एरोइड प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके अलावा, ज़िज़िफस रुगोसा, कॉस्टसस्पेशियस, हेडीचियम कोरोनारियम, बल्बोफिलम क्रैसिपेस, ओफियोग्लोसम प्रजातियाँ, एलस्टोनियास्कोलारिस और आर्टोअर्पुसलागुचा जैसी प्रजातियाँ, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं, यहाँ प्रचुर मात्रा में हैं।

जीव-जंतुओं की समृद्धि

सारंडा का जंगल केवल वनस्पतियों तक सीमित नहीं है; यह 28 स्तनधारी प्रजातियों, 60 पक्षी प्रजातियों, 20 सरीसृप प्रजातियों, 8 उभयचर प्रजातियों और 63 तितली प्रजातियों का भी आश्रय स्थल है। यह क्षेत्र छोटानागपुर जैव-भौगोलिक क्षेत्र का हिस्सा है और इसका भूदृश्य ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगलों से जुड़ा हुआ है। इसकी निरंतरता इसे विशाल बनाती है, जिसमें कई स्थानिक और लुप्तप्राय प्रजातियाँ शामिल हैं।

हाथियों का गलियारा

सारंडा का क्षेत्र मध्य भारतीय हाथियों की आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण गलियारा है, जो ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बीच विचरण करते हैं। यह जंगल न केवल जैव-विविधता का खजाना है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सारंडा के जंगलों का ऐतिहासिक और प्रशासनिक वैभव

सारंडा प्रमंडल के घने जंगल, जो कभी कोल्हान एस्टेट के रूप में पोरहाट के राजा (जिन्हें सिंहभूम के राजा के नाम से जाना जाता था) की संपत्ति थे, 1836 में ब्रिटिश सरकार के अधीन आ गए। इसके अगले वर्ष, 1837 में, यहाँ पहला भू-बंदोबस्त हुआ। इसके बाद 1855, 1867, 1897 और 1918 में बस्तियाँ बसाई गईं। इन जंगलों की ऊपरी और तीव्र ढलानों पर पहले "झूमिंग" या स्थानांतरित खेती प्रचलित थी, जबकि निचली ढलानों और समतल भूमि पर "गोरा" या शुष्क खेती की जाती थी।

जंगलों का संरक्षण और आरक्षण

जंगलों को संरक्षित करने का पहला प्रयास 1864 में बंगाल के वन संरक्षक डॉ. एंडरसन की अध्यक्षता में गठित जाँच कमेटी द्वारा शुरू हुआ। 26 नवंबर 1880 को भारतीय वन अधिनियम 1878 की धारा 4 के तहत 1,99,740 एकड़ क्षेत्र को अधिसूचित किया गया और 17 मई 1882 को धारा 19 के तहत इसे आरक्षित वन घोषित किया गया, जो 1 अप्रैल 1889 से प्रभावी हुआ। हालाँकि, सारंडा को 1882 में ही आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित किया गया था। इस दौरान जंगल की सीमाओं का सीमांकन पूरा हुआ, लेकिन कुछ हिस्से लंबे समय तक अनिश्चित रहे। ब्रिटिश अधिसूचना में सीमाओं को क्योंझर, बोनई और गंगपुर राज्यों की साझा सीमा के रूप में परिभाषित किया गया था।

प्रशासनिक विकास का इतिहास

• 1880-81: सिंहभूम वन को हजारीबाग के प्रशासनिक नियंत्रण में शामिल किया गया।

• 1884-85: छोटानागपुर वन प्रभाग की स्थापना, जिसमें सिंहभूम, पलामू और कोडरमा के जंगल शामिल थे।

• 1890: एक स्वतंत्र सिंहभूम वन प्रभाग बनाया गया, जिसमें सारंडा, कोल्हान, पोरहाट और चाईबासा रेंज शामिल थीं।

• 1893-94: सारंडा रेंज को समता और कोइना रेंज में विभाजित किया गया।

• 1906-07: कोल्हान संरक्षित वनों को मिलाकर चाईबासा वन प्रभाग बनाया गया।

• 1912: सैतबा, संतरा और लाटुआ आरएफ ब्लॉक को सिंहभूम से चाईबासा डिवीजन में स्थानांतरित किया गया।

• 1916: पोरहाट डिवीजन की स्थापना, और सैतबा, संतरा और लाटुआ ब्लॉकों को चाईबासा से सिंहभूम डिवीजन में वापस स्थानांतरित किया गया।

• 1924: सिंहभूम वन प्रभाग को कोल्हान और सारंडा प्रभागों में विभाजित किया गया। सारंडा प्रभाग में कोइना, समता और त्रिलपोसी पर्वतमालाएँ शामिल थीं।

• 1927: कोइना रेंज को कोइना और गुआ रेंज में विभाजित किया गया।

• 1931-32: त्रिलपोसी रेंज को समता रेंज में समाहित किया गया।

• 1995: गुआ और समता पर्वतमालाओं को विभाजित कर सासंगदा पर्वतमाला बनाई गई।

• 2024: वन सफारी के लिए ऑनलाइन बुकिंग शुरू हुई।

इतिहास

बामियाबुरु सैंक्चुरी

बामियाबुरु सैंक्चुरी बिहार की सबसे पुरानी सैंक्चुरी है, जिसे 1932 में 128 वर्ग किमी के एरिया में बनाया गया था। यह सिंहभूम जिले के कोल्हान फॉरेस्ट डिवीजन में था ।

सासंगदाबुरु सैंक्चुरी

सासंगदाबुरु सैंक्चुरी सिंहभूम जिले के सारंडा फॉरेस्ट डिवीजन में 92 वर्ग किमी के एरिया में फैली हुई थी , जिसमें पूरे देश के कुछ सबसे अच्छे साल के जंगल शामिल हैं।

सारंडा जंगल पर उच्चतम न्यायालय और झारखंड सरकार

सारंडा जंगल, झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित एशिया का सबसे बड़ा सल वन क्षेत्र, पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच लंबे विवाद का केंद्र रहा है। यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है, जहां हाथी, स्लॉथ बेयर, एंटीलोप और 138 से अधिक पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। साथ ही, यहां देश के 26% लौह अयस्क भंडार हैं, जो अवैध खनन और आर्थिक हितों से जुड़े हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 2022 के आदेश के अनुपालन में उच्चतम न्यायालय ने झारखंड सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। वर्तमान तिथि (25 अक्टूबर 2025) तक, सरकार ने अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया पूरी कर ली है, लेकिन कुछ विवाद बाकी हैं। नीचे विस्तृत जानकारी दी गई है।

पृष्ठभूमि

• एनजीटी का आदेश (12 जुलाई 2022): एनजीटी की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ ने सारंडा/ससांगदा अभयारण्य के आसपास इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने और इसे वन्यजीव अभयारण्य बनाने का निर्देश दिया। यह क्षेत्र 1968 में अविभाजित बिहार द्वारा "गेम सेंचुरी" घोषित किया गया था, लेकिन अधिसूचना लंबित रही।

• उच्चतम न्यायालय में मामला: पर्यावरण कार्यकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई। झारखंड सरकार ने आदिवासी अधिकारों (पांचवीं अनुसूची), खनन राजस्व और राष्ट्रीय परियोजनाओं (चंद्रयान, रक्षा) का हवाला देकर देरी की।

• स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL): अपनी किरीबुरु और मेघाहातुबुरु खदानों के संचालन की अनुमति मांगी, जो चंद्रयान और पनडुब्बी परियोजनाओं के लिए आवश्यक हैं।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: प्रमुख घटनाक्रम

सारंडा को वन्यजीव अभयारण्य (वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी) घोषित करने का मामला 2012 से अदालतों में है। यहाँ क्रमबद्ध रूप से मुख्य घटनाएँ हैं:

2012 झारखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका

विधायक सरयू राय ने "सारंडा संरक्षण अभियान" शुरू कर हाईकोर्ट में PIL दायर की। कोर्ट ने वन संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश दिए।

2022 NGT का आदेश

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने झारखंड सरकार को 400 वर्ग किमी क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का निर्देश दिया। राज्य ने समय पर पालन नहीं किया।

अप्रैल 2024 सुप्रीम कोर्ट का प्रारंभिक आदेश

NGT के निर्देशों का पालन न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। पर्यावरणविद् डॉ. आरके सिंह ने याचिका दायर कर 57,000 हेक्टेयर क्षेत्र को सैंक्चुअरी बनाने की मांग की।

सितंबर 2025 सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी

कोर्ट ने झारखंड सरकार को अवमानना का दोषी ठहराया। मुख्य सचिव को तलब किया और कहा कि अधिसूचना न जारी होने पर जेल हो सकती है। पीठ: जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन।

7 अक्टूबर 2025 राहत का आदेश

कोर्ट ने 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की अनुमति दी, लेकिन एक सप्ताह में शपथ पत्र दाखिल करने को कहा।

14-16 अक्टूबर 2025 अधिसूचना जारी, लेकिन विवाद

झारखंड सरकार ने 314.68 वर्ग किमी क्षेत्र को सैंक्चुअरी घोषित किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की योजना बना रही है, क्योंकि स्थानीय निवासी और खनन लॉबी विरोध कर रहे हैं।

17 अक्टूबर 2025 की सुनवाई में सरकार ने 250 वर्ग किमी को ही अभ्यारण्य बनाने की अपील की।

प्रमुख मुद्दे

1. पर्यावरण संरक्षण बनाम खनन:

o सारंडा, झारखंड का एक जैव-विविधता से समृद्ध सल वन क्षेत्र है, जो अवैध लौह अयस्क खनन से खतरे में है।

o सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का आदेश दिया, लेकिन खनन लॉबी और स्थानीय हितों का विरोध है।

2. सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप:

o झारखंड सरकार ने 2012 से 2022 तक NGT के आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में अवमानना नोटिस जारी किया।

o अक्टूबर 2025 में 31,468.25 हेक्टेयर को अभयारण्य घोषित किया गया, लेकिन यह प्रस्तावित 57,000 हेक्टेयर का केवल आधा है।

3. स्थानीय विरोध और विस्थापन की आशंका:

o स्थानीय निवासी और नेताओं (जैसे चाईबासा सांसद जोबा माझी) का कहना है कि अभयारण्य घोषणा से आदिवासी समुदायों का विस्थापन हो सकता है।

o हेमंत सोरेन सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने की योजना बना रही है।

4. आर्थिक बनाम पर्यावरणीय टकराव:

o खनन से झारखंड की अर्थव्यवस्था को लाभ होता है, लेकिन यह पर्यावरण और वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाता है।

o पर्यावरणविद् (जैसे डॉ. आरके सिंह) का तर्क है कि अभयारण्य से दीर्घकालिक संरक्षण और स्थानीय संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग संभव है।

5. कानूनी विलंब:

o 2012 में झारखंड हाईकोर्ट में शुरू हुई जनहित याचिका से लेकर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक, इस मामले में बार-बार देरी हुई है।

सारंडा को अभ्यारण्य बनाने पर क्या जनजातियों का विस्थापन होगा और अधिकार बाधित होंगे

• नहीं, अनिवार्य विस्थापन नहीं होगा: वन्यजीव अभयारण्य (वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी) घोषणा राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) से अलग है। राष्ट्रीय उद्यान में कोई मानवीय बस्ती या गतिविधि की अनुमति नहीं होती, लेकिन अभयारण्य में आदिवासी समुदायों को रहने, खेती करने और वन संसाधनों का उपयोग करने का अधिकार बना रहता है। सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी (के. परमेश्वर) ने स्पष्ट कहा है कि "अभयारण्य घोषणा से जनजातीय या वनवासियों के अधिकार समाप्त नहीं होंगे।"

• झारखंड सरकार की प्रतिबद्धता: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 14 अक्टूबर 2025 को कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि "वनवासी जनजातियों का कोई विस्थापन नहीं होगा।" सरकार ने 314 वर्ग किमी क्षेत्र को अधिसूचित करने का प्रस्ताव पास किया, लेकिन यह सुनिश्चित करने का वादा किया कि आदिवासी कल्याण योजनाओं से जुड़े रहें और विस्थापन न हो।

• सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घोषणा से स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) जैसे वैध खनन कार्य प्रभावित नहीं होंगे, और आदिवासी बस्तियों को छूट दी जाएगी। हालांकि, अभयारण्य के 1 किमी परिधि में खनन प्रतिबंधित होगा, जो अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय आजीविका प्रभावित कर सकता है।

अधिकार बाधित होंगे या नहीं?

• कानूनी सुरक्षा:

o वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006: यह आदिवासियों को वन भूमि पर व्यक्तिगत/सामुदायिक अधिकार (जैसे लघु वन उत्पाद संग्रह, चराई, धार्मिक स्थल) देता है। अभयारण्य घोषणा से ये अधिकार प्रभावित नहीं होते; बल्कि, इन्हें पहले सेटल करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट और एमिकस ने जोर दिया कि FRA के तहत अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

o संविधान की पांचवीं अनुसूची: सारंडा पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है, जो आदिवासी क्षेत्रों की रक्षा करता है।

सारंडा अभयारण्य घोषणा पर आदिवासियों की प्रमुख शंकाएँ

1. विस्थापन का भय

2. आर्थिक आजीविका पर असर

3. सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों का हनन

सकारात्मक पक्ष: सुप्रीम कोर्ट और एमिकस क्यूरी ने स्पष्ट किया कि FRA अधिकार सुरक्षित रहेंगे, और विस्थापन न्यूनतम होगा।

सकारात्मक प्रभाव

1. जैव-विविधता संरक्षण:

o प्रभाव: सारंडा एशिया का सबसे बड़ा सल वन है, जो हाथी, बाघ, तेंदुआ, और सैकड़ों पक्षी प्रजातियों का निवास है। अभयारण्य घोषणा से अवैध खनन और वन कटाई पर रोक लगेगी, जिससे जैव-विविधता सुरक्षित होगी।

o विवरण: राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) और सुप्रीम कोर्ट ने 400 वर्ग किमी क्षेत्र को संरक्षित करने का आदेश दिया था, जिसका पहला चरण (314 वर्ग किमी) लागू हो चुका है। इससे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ दीर्घकालिक लाभ होगा।

o आदिवासियों के लिए लाभ: स्वच्छ जल, वन संसाधन (महुआ, तेंदू पत्ता) और पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर आदिवासी समुदायों को लंबे समय में लाभ होगा।

2. अवैध खनन पर नियंत्रण:

o प्रभाव: सारंडा में लौह अयस्क का अवैध खनन (2000-2010 के दशक में व्यापक) ने वन को नष्ट किया। अभयारण्य के 1 किमी परिधि में खनन प्रतिबंध से पर्यावरणीय क्षति रुकेगी।

o विवरण: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वैध खनन (जैसे SAIL) को छूट मिलेगी। पर्यावरणविद् डॉ. आरके सिंह का कहना है कि इससे "खनन माफिया" पर अंकुश लगेगा।

o आदिवासियों के लिए लाभ: खनन से होने वाला 80-90% विस्थापन (ज्यादातर आदिवासी) कम होगा।

3. आदिवासी अधिकारों की कानूनी सुरक्षा:

o प्रभाव: वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006) और पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासियों के व्यक्तिगत/सामुदायिक अधिकार (जैसे वन उत्पाद, चराई, धार्मिक स्थल) सुरक्षित रहेंगे।

o विवरण: सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी (के. परमेश्वर) ने 17 अक्टूबर 2025 को कहा कि अभयारण्य से बस्तियाँ नहीं हटेंगी, और FRA दावों का निपटारा प्राथमिकता होगी।

o आदिवासियों के लिए लाभ: दीर्घकाल में जल-जंगल-जमीन की रक्षा से आदिवासी संस्कृति और आजीविका बचेगी।

4. पर्यटन और वैकल्पिक रोजगार:

o प्रभाव: अभयारण्य से इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय आदिवासियों को गाइड, होमस्टे, और हस्तशिल्प जैसे वैकल्पिक रोजगार मिल सकते हैं।

o विवरण: पर्यावरण मंत्रालय ने सारंडा में इको-टूरिज्म मॉडल प्रस्तावित किया है, जैसे कि असम के मानस नेशनल पार्क में।

5. जलवायु और वैश्विक महत्व:

o प्रभाव: सारंडा कार्बन सिंक के रूप में कार्य करता है। इसका संरक्षण जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेगा।

o विवरण: 57,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र की रक्षा से CO2 अवशोषण बढ़ेगा, जो वैश्विक पर्यावरण लक्ष्यों (जैसे पेरिस समझौता) में योगदान देगा।

o

सरांडा वन, झारखंड का एक जैव-विविधता से समृद्ध क्षेत्र, अपने घने साल जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक स्थलों जैसे झिंगरा, झाटी सिरिंग, पांचघघ जलप्रपात, सनराइज पॉइंट और लेक गार्डन के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र किरीबुरू और मेघाहातूबुरू जैसे हिल स्टेशनों के साथ पर्यटकों को आकर्षित करता है। हालांकि, लौह अयस्क खनन ने इसकी पारिस्थितिकी को खतरे में डाला है। सुप्रीम कोर्ट और NGT के 2022-2025 के आदेशों ने 314 वर्ग किमी को वन्यजीव अभयारण्य घोषित कर संरक्षण को बढ़ावा दिया है, साथ ही राष्ट्रीय हितों के लिए सीमित खनन की अनुमति दी है। यह आदिवासी अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन का प्रयास है। सरांडा का प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत इसे एक अनमोल खजाना बनाता है, जिसे संरक्षित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।