सरदार रमना पहाड़िया : स्वतंत्रता संग्राम के पहले सेनानी

सरदार रमना पहाड़िया (जिन्हें रमना आहड़ी या रमना अहाड़ी भी कहा जाता है) झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र के एक अग्रणी आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पहाड़िया जनजाति से संबंधित थे और उन्हें औपनिवेशिक काल में झारखंड के आदिवासियों के प्रथम संगठित प्रतिरोध का नेतृत्व करने का श्रेय दिया जाता है। उनका संघर्ष 1760 के दशक में, तिलका मांझी जैसे अन्य प्रसिद्ध नेताओं से भी पहले शुरू हुआ। रमना पहाड़िया ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक शोषण नीतियों, जैसे लगान वसूली और जंगल-जमीन पर अधिकार के हनन के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया।

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12/1/20251 min read

सरदार रमना पहाड़िया (जिन्हें रमना आहड़ी या रमना अहाड़ी भी कहा जाता है) झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र के एक अग्रणी आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पहाड़िया जनजाति से संबंधित थे और उन्हें औपनिवेशिक काल में झारखंड के आदिवासियों के प्रथम संगठित प्रतिरोध का नेतृत्व करने का श्रेय दिया जाता है। उनका संघर्ष 1760 के दशक में, तिलका मांझी जैसे अन्य प्रसिद्ध नेताओं से भी पहले शुरू हुआ। रमना पहाड़िया ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक शोषण नीतियों, जैसे लगान वसूली और जंगल-जमीन पर अधिकार के हनन के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया।

1766 में, उन्होंने लगभग 1200 पहाड़िया सैनिकों का नेतृत्व करते हुए माचंला पहाड़ की तराई में मुगलों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना के खिलाफ एक महत्वपूर्ण युद्ध लड़ा। इस युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनकी शहादत ने आदिवासी एकता और प्रतिरोध की भावना को प्रेरित किया। उनका संघर्ष न केवल एक सशस्त्र विद्रोह था, बल्कि अपनी जल, जंगल, जमीन और पारंपरिक आजीविका की रक्षा के लिए एक सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक भी था। उनकी विरासत ने तिलका मांझी, सिदो-कान्हू और बिरसा मुंडा जैसे भविष्य के आदिवासी नेताओं को प्रेरित किया और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध की नींव रखी।

परिचय और ऐतिहासिक संदर्भ

सरदार रमना पहाड़िया की पहचान

नाम: सरदार रमना आहड़ी, जिन्हें रमना पहाड़िया या रमना अहाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

समुदाय: वे पहाड़िया जनजाति (पहाड़ी आदिवासी समुदाय) से संबंधित थे।

क्षेत्र: उनका प्रभाव क्षेत्र झारखंड के संथाल परगना में माचंला पहाड़ के आसपास माना जाता है।

ऐतिहासिक स्थिति: वे एक प्रमुख आदिवासी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के प्रारंभिक आदिवासी विद्रोहों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।

विद्रोह की पृष्ठभूमि

आर्थिक शोषण: रमना पहाड़िया का विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक शोषणकारी नीतियों का सीधा परिणाम था। इन नीतियों में लगान वसूली, जंगलों पर कब्जा और आदिवासियों के पारंपरिक भूमि अधिकारों का हनन शामिल था।

राजनीतिक कारण: 1765 में मुगलों द्वारा अंग्रेजों को बंगाल की दीवानी सौंप दिया जाना स्वतंत्र पहाड़िया सरदारों को स्वीकार्य नहीं था, जिसने विद्रोह की आग को और भड़काया।

आजीविका पर हमला: अंग्रेज आदिवासियों की पारंपरिक आजीविका, जैसे चावल की खेती, नमक उत्पादन और चाय की बेल, को नष्ट कर रहे थे, जिससे यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई बन गया।

प्रमुख विद्रोह और सैन्य रणनीति

1766 का विद्रोह

नेतृत्व और सेना: 1766 में, रमना आहड़ी ने लगभग 1200 पहाड़िया सैनिकों की एक टुकड़ी का नेतृत्व किया।

विरोधी: उन्होंने माचंला पहाड़ की तराई में मुगल और ब्रिटिश की संयुक्त सेना के खिलाफ एक घमासान युद्ध लड़ा।

उद्देश्य: यह युद्ध कंपनी सरकार की कर वसूली के विरोध में था और इसका मुख्य लक्ष्य आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और स्वशासन की रक्षा करना था।

परिणाम: इस युद्ध में रमना आहड़ी वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनका बलिदान आदिवासी प्रतिरोध के लिए एक स्थायी प्रेरणा बन गया।

गुरिल्ला युद्ध कौशल

रणनीति: रमना आहड़ी गुरिल्ला युद्ध की रणनीति में माहिर थे। वे और उनके साथी ब्रिटिश शिविरों पर आकस्मिक हमले करते थे, जिससे अंग्रेज अधिकारियों को पहाड़ी इलाकों में घुसपैठ करने में भारी कठिनाई होती थी।

प्रभाव: पहाड़िया क्रांतिकारियों के हमलों से कलकत्ता-बनारस मार्ग इतना अधिक प्रभावित था कि अंग्रेजों को इस मार्ग की सुरक्षा के लिए विशेष सैन्य टुकड़ियां नियुक्त करनी पड़ीं।

प्रशिक्षक की भूमिका: यह भी कहा जाता है कि वे पहाड़िया समुदाय को गुरिल्ला युद्ध के तरीके सिखाते थे, जिससे प्रतिरोध को व्यापक आधार मिला।

प्रभाव क्षेत्र: थीतोनाला, जामताड़ा और कुड़हेइत जैसे क्षेत्रों में उनके नेतृत्व में कंपनी के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ, जिसमें कई पहाड़िया क्रांतिकारियों ने अपना रक्त बहाया।

अंतिम संघर्ष और शहादत

अंतिम युद्ध: जून 1766 में मिलंचा पहाड़ की तराई में, रमना आहड़ी की अगुवाई में पहाड़िया लड़ाकों ने तीर और भालों से मुगल और अंग्रेजी संयुक्त सेना को पीछे खदेड़ दिया।

पराजय और मृत्यु: हालांकि, बाद में दुश्मन की भारी सेना के सामने वे टिक नहीं सके। रमना आहड़ी घायल अवस्था में पकड़ लिए गए और उनकी हत्या कर दी गई।

विरासत और ऐतिहासिक महत्व

प्रतिरोध के अग्रदूत

प्रथम संगठित विद्रोह: रमना आहड़ी का संघर्ष औपनिवेशिक काल में झारखंड के आदिवासियों का पहला संगठित प्रतिरोध माना जाता है। उन्होंने तिलका मांझी से भी पहले अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाए थे।

ब्रिटिश क्रूरता: अंग्रेजों ने पहाड़िया क्रांतिकारियों के मनोबल को तोड़ने के लिए क्रूरता का सहारा लिया। वे क्रांतिकारियों के सिर काटकर ऊँची जगहों पर लटका देते थे, ताकि अन्य लोग डर जाएँ। इसके बावजूद, पहाड़िया लड़ाकों ने अपनी जमीन की रक्षा के लिए बलिदान देना श्रेष्ठ समझा।

प्रेरणा का स्रोत

प्रतिरोध की निरंतरता: रमना आहड़ी की शहादत ने संघर्ष को समाप्त नहीं किया। उनके बाद, पहाड़िया सरदार करिया पुजहर, चगडु सांवरिया और पाचगे डोम्बो ने मिलकर उधवा नाला के पास मुगल और अंग्रेजी सैन्य शिविर पर हमला कर उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया।

भविष्य के आंदोलनों पर प्रभाव: उनके द्वारा जलाई गई चेतना की लौ को बाद में तिलका मांझी, सिदो-कान्हू (संथाल हूल, 1855-56) और बिरसा मुंडा जैसे नेताओं ने आगे बढ़ाया।

सांस्कृतिक और आर्थिक संघर्ष

सांस्कृतिक संरक्षण: उनका संघर्ष केवल एक सशस्त्र विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति और परंपरागत आजीविका को औपनिवेशिक शोषण से बचाने का प्रतीक भी था। उन्होंने उस परंपरा को चुनौती दी जहाँ ब्रिटिश आदिवासियों के जीवन-यापन के साधनों को नष्ट कर रहे थे।

समकालीन प्रासंगिकता

निरंतर संघर्ष: स्वतंत्रता के बाद भी, पहाड़िया समुदाय की स्थिति दयनीय बनी हुई है। उनकी जमीनों पर खनन और बाहरी हस्तक्षेप आज भी जारी है, जो दर्शाता है कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संघर्ष अभी भी प्रासंगिक है।