पथलगड़ी

मुंडा और झारखंड-ओडिशा-छत्तीसगढ़ के अन्य आदिवासी समुदायों जैसे ओरांव, हो, संथाल आदि में पथलगड़ी (पत्थलगड़ी या सासंदिरी) एक अत्यंत प्राचीन परंपरा है, जो वास्तव में मेगालिथिक संस्कृति (Megalithic Culture) का जीवंत अवशेष है। मुंडाओं में पथलगड़ी की प्राचीन प्रथा। यह प्रथा विश्व भर में ऐतिहासिक व प्रागैतिहासिक काल की प्रथा है। इसे मेगालिथ के नाम से जाना जाता है। ये पथलगड़ी के पत्थर वही हैं जिन्हें पुरातत्व में मेनहिर (Menhir)/डोल्मेन कहते हैं।

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12/2/20251 min read

मेगालिथ (Megalith) शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जहाँ "मेगा" का अर्थ "विशाल" और "लिथ" का अर्थ "पत्थर" होता है। सरल शब्दों में, ये प्रागैतिहासिक काल (लगभग 5000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक) में बने विशाल पत्थरों से निर्मित संरचनाएँ हैं। ये पत्थर इतने बड़े होते हैं कि इन्हें उठाने के लिए आधुनिक मशीनों की भी जरूरत पड़ सकती है – कुछ तो 20-50 टन वजनी होते हैं! प्राचीन लोग इन्हें बिना किसी उन्नत तकनीक के खड़े करते थे, जो आज भी एक रहस्य है।

ये संरचनाएँ मुख्य रूप से यूरोप (जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, आयरलैंड), एशिया (भारत, जापान) और अफ्रीका में पाई जाती हैं। भारत में भी दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में मेगालिथिक दफन स्थल मिले हैं, जहाँ पत्थर के गोले (डोलमेन) और खंभे (मेनहिर) देखने को मिलते हैं।

।महापाषाणों के मुख्य प्रकार हैं मेनहिर (एकल खड़े पत्थर), डोलमेन्स (एक कैपस्टोन को सहारा देने वाले सीधे पत्थरों से बने कक्ष, जिन्हें अक्सर कब्रों के रूप में उपयोग किया जाता है), और पत्थर के घेरे(पत्थरों की व्यवस्थित पंक्तियाँ )। अन्य प्रकारों में शामिल हैं पैसेज ग्रेव्स, जिनमें कक्ष तक जाने के लिए एक मार्ग होता है, और सिस्ट, जो दफनाने के लिए छोटे, भूमिगत पत्थर से बने बक्से होते हैं।

मेनहिर : बड़े, एकल, सीधे पत्थर। अक्सर धार्मिक या औपचारिक प्रयोजनों के लिए या चिह्न के रूप में उपयोग किया जाता है। व्यक्तिगत रूप से या पंक्तियों (संरेखण) में पाई जा सकती है।

डोलमेन्स : एक कक्ष जो ऊर्ध्वाधर पत्थरों से निर्मित है तथा एक बड़े, सपाट शिखर-पत्थर को सहारा देता है ।मुख्यतः दफन कक्ष के रूप में उपयोग किया जाता है। सरल, आयताकार या बहुकोणीय हो सकती हैं।

पत्थर के घेरे : खड़े पत्थरों की गोलाकार व्यवस्था। अनुष्ठानों, धार्मिक अनुष्ठानों या सामाजिक समारोहों के लिए उपयोग किया जाता है।

अन्य प्रकार

  • ताबूत (Cist): छोटे, पत्थर से बने बक्से जो आमतौर पर भूमिगत दफनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

  • मार्ग कब्रें: एक प्रकार का डोलमेन जिसमें दफन कक्ष तक जाने वाला मार्ग होता है।

  • बैरो: दफन टीले जो अक्सर डोलमेन जैसी अन्य महापाषाण संरचनाओं को ढक लेते हैं।

  • केर्न्स: पत्थरों के टीले, जो कभी-कभी कब्रों या अन्य संरचनाओं को ढकते हैं।

प्रसिद्ध मेगालिथ स्थल

दुनिया भर में हजारों मेगालिथ हैं, लेकिन कुछ खास हैं:

  1. स्टोनहेंज (Stonehenge), इंग्लैंड: यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल। यह लगभग 5000 साल पुराना है और सूर्य की किरणों के साथ संरेखित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यहाँ ग्रीष्म संक्रांति पर सूर्योदय देखने के लिए इकट्ठा होते थे।

  2. कार्नाक (Carnac), फ्रांस: 3000 से अधिक मेनहिरों की पंक्तियाँ – दुनिया का सबसे बड़ा मेगालिथिक संग्रह।

  3. न्यूग्रेंज (Newgrange), आयरलैंड: 5200 साल पुराना, जहाँ विंटर सोल्स्टाइस पर सूर्य की रोशनी सीधे अंदर पहुँचती है।

  4. भारत में: तमिलनाडु के आदिचनल्लूर में मेगालिथिक दफन मिले हैं, जो लौह युग (1200 ईसा पूर्व) के हैं। यहाँ कंकालों के साथ बर्तन और आभूषण भी पाए गए।

मेगालिथ क्यों बनाए गए? रहस्य और सिद्धांत

प्राचीन लोग मेगालिथ क्यों बनाते थे, इसका सटीक कारण अज्ञात है, लेकिन कुछ सिद्धांत हैं:

  • धार्मिक महत्व: ये पूजा स्थल या पूर्वजों की पूजा के लिए।

  • खगोलीय कैलेंडर: सूर्य, चंद्रमा और तारों के संरेखण से मौसम बताने के लिए।

  • सामाजिक एकता: इन्हें बनाने में पूरा समुदाय लगता था, जो सामूहिक शक्ति का प्रतीक था।

  • दफन और स्मृति: मृतकों को दफनाने और उनकी याद रखने के लिए।

आधुनिक अध्ययन (जैसे कार्बन डेटिंग) से पता चलता है कि ये संरचनाएँ निओलिथिक (नवपाषाण) और ब्रॉन्ज एज में बनीं

झारखंड में महापाषाण /पथलगड़ी

झारखंड में महापाषाण या मेगालिथिक स्थलों का एक अपार खजाना छिपा है। ' झारखंड के आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं का यह अभिन्न हिस्सा हैं। ओरांव, हो, असुर, भूमिज और मुंडा समुदाय इस परंपरा की महापाषाण कब्रें बनाते हैं।

मुंडाओं में पथलगड़ी की यह प्राचीन प्रथा काफी महत्वपूर्ण है । मुंडाओं में जो मेगालिथ प्रथा की पथलगड़ी प्रचलित है उसके कई प्रकार है

होरादिरी - यह वह पत्थर है जिस पर वंश वृक्ष लिखा जाता है।

चल्पादिरी या सासनदिरी - यह किसी भी गांव और उसकी सीमाओं की सीमा को चिह्नित करने वाला पत्थर है।

मगोदिरी - यह उस सामाजिक अपराधी का क़ब्र का पत्थर है जिसने बहुविवाह या असामाजिक विवाह किया हो।

ज़िददिरी - यह एक ऐसा पत्थर है जिसके नीचे नवजात शिशु के गर्भनाल और सूखे नाभि को दफनाया जाता है।

बिददिरी' और 'थेनदिरी'- मृतक की स्मृति-पट्टिका

मृत्यु के एक वर्ष बाद 'बिददिरी' और 'थेनदिरी' सम्पन्न होते थे अर्थात्, मृतक की स्मृति-पट्टिकाओं का लगाया जाना । इन विधियों में काफी व्यय होता था । वास्तविक समारोह से कुछ दिन पूर्व दो पत्थर -एक चपटा तथा दूसरा लम्बा एवं पतला चुन लिये जाते थे । चपटा पत्थर 'थेनदिरी' तथा दूसरा 'बिद-दिरी' के काम आता था । थेनदिरी' के दिन ही या अगले दिन 'बिददिरी' का पत्थर खड़ा किया जाता था । बिददिरी को मृतक के घर जाने वाली सड़क पर लगाया जाता था । कभी-कभी तो उसके घर के हाते में भी गाड देते थे । कभी-कभी बिददिरी पत्थर पर मृतक का नाम, गाँव और गोत्र लिखे जाते थे ।

झारखंड में मेगालिथ की खोज

झारखंड के इन मेगालिथों की खोज का श्रेय ब्रिटिश अधिकारियों को जाता है। टी.एफ. पेपे ने सबसे पहले इनकी पहचान की , जबकि छोटानागपुर (अब झारखंड) के तत्कालीन आयुक्त कर्नल ई.टी. डाल्टन ने इन्हें सबसे पहले दस्तावेजीकृत किया था । जनवरी 1872 में डाल्टन ने चोकाहातू का दौरा किया, क्षेत्र को नापा और कब्रों की गिनती की, अनुमान लगाया कि यह 2,000 वर्ष से अधिक पुराना है। 1873 में उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के लिए एक लेख में इसे वर्णित किया, जिसमें 7 एकड़ क्षेत्र में 7,300 पत्थरों का उल्लेख है।

चोकाहातु : मुंडाओं की शोक भूमि

चोकाहातू रांची के निकट सोनाहातू के पास स्थित है, जो लगभग 7 एकड़ में फैला हुआ है और भारत का सबसे बड़ा महापाषाण स्थलों में से एक माना जाता है। जनवरी 1872 में डाल्टन ने चोकाहातू का दौरा किया, क्षेत्र को नापा और कब्रों की गिनती की, अनुमान लगाया कि यह 2,000 वर्ष से अधिक पुराना है। 1873 में उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के लिए एक लेख में इसे वर्णित किया, जिसमें 7 एकड़ क्षेत्र में 7,300 पत्थरों का उल्लेख है। यह स्थल 22 बीघा और 16 कठ्ठा (लगभग 12-15 एकड़) क्षेत्र में फैला है, जिसमें करीब 8,000 से अधिक महापाषाण संरचनाएं (कब्र चिह्न) हैं। यहाँ डोलमेन अधिक है मगर कुछ मेनहीर महापाषाण भी है। स्थानीय मुंडारी भाषा में 'चोकाहातू' का अर्थ है 'शोक की भूमि' या 'दुख का स्थान', जो मृतकों के लिए शोक स्थल के रूप में जाना जाता है। यह मुंडा जनजाति का प्राचीन ससांदिरि स्थल है। चोकाहातू आज भी जीवंत विरासत है, जहां मुंडा लोग दाह संस्कार (हड़गड़ी) करते हैं।

चोकाहातू और झारखंड के अन्य महापाषाण स्थल सिर्फ पत्थरों का संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत साँस लेती सभ्यता का प्रमाण हैं। यहाँ हर ससांदिरि, हर मेनहिर और हर दफन पट्टा एक परिवार की याद, एक जनजाति की आस्था और हजारों साल पुरानी निरंतर परंपरा की गवाही देता है।

दुनिया के ज्यादातर मेगालिथिक स्थल आज केवल पर्यटन और पुरातत्व की किताबों तक सिमट गए हैं, लेकिन चोकाहातू आज भी जी रहा है – यहाँ आज भी नए पत्थर खड़े किए जा रहे हैं, नए नाम उकेरे जा रहे हैं। यही इसे भारत ही नहीं, विश्व का सबसे अनोखा और सबसे बड़ा जीवंत महापाषाण स्थल बनाता है।

यह हमारी माटी का वो गौरवशाली अध्याय है जो अभी तक अंधेरे में है। यदि इसे समय रहते संरक्षित किया गया, यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाया गया और वैज्ञानिक खुदाई कराई गई, तो झारखंड का यह कोना दुनिया को प्राचीन मानव-सभ्यता की एक नई कहानी सुना सकता है।

चोकाहातू सिर्फ मुंडा जनजाति का ससान नहीं, यह समूचे भारत की उस प्राचीन जड़ का प्रतीक है जो आज भी हरी-भरी है। इसे बचाना हमारा कर्तव्य है – क्योंकि जब तक ये पत्थर खड़े हैं, तब तक हमारी माटी की आत्मा भी जीवित रहेगी।