कुडुख भाषा की वर्तमान लिपियाँ
कुड़ुख एक उत्तर द्रविड़ भाषा है जो भारत और पड़ोसी देशों में लगभग 20-25 लाख लोगों द्वारा बोली जाती है, जिनमें मुख्य रूप से ओरांव (कुड़ुख) और किसान समुदाय शामिल हैं। यह भाषा मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में केंद्रित है। इसके लेखन के लिए कई लिपियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें तीन प्रमुख हैं: देवनागरी, तोलोंग सिकि, और कुड़ुख बन्ना।
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1/17/20261 min read
कुड़ुख एक उत्तर द्रविड़ भाषा है जो भारत और पड़ोसी देशों में लगभग 20-25 लाख लोगों द्वारा बोली जाती है, जिनमें मुख्य रूप से ओरांव (कुड़ुख) समुदाय शामिल हैं। यह भाषा मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में केंद्रित है। इसके लेखन के लिए कई लिपियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें तीन प्रमुख हैं: देवनागरी, तोलोंग सिकि, और कुड़ुख बन्ना।
देवनागरी आज सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली लिपि है, जिसे शिक्षा और प्रकाशनों में आधिकारिक दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, कुड़ुख की विशिष्ट ध्वनियों को सटीक रूप से दर्शाने के लिए दो समर्पित लिपियों का आविष्कार किया गया। कुड़ुख बन्ना, 1991 में बासुदेव राम खलखो द्वारा विकसित एक आबुगिडा (अक्षरात्मक) लिपि है और यह विशेष रूप से ओडिशा में लोकप्रिय है।
इसके विपरीत, तोलोंग सिकि, 1999 में डॉ. नारायण उरांव द्वारा आविष्कृत एक शुद्ध वर्णमाला (अल्फाबेटिक) लिपि है। इसे 2007 में झारखंड सरकार द्वारा आधिकारिक मान्यता दी गई, जो इसका सबसे बड़ा गढ़ है। कुड़ुख लिटरेरी सोसाइटी द्वारा सक्रिय प्रचार, यूनिकोड 17.0 में इसके मानकीकरण के माध्यम से मजबूत डिजिटल समर्थन और आधिकारिक संरक्षण के कारण तोलोंग सिकि की लोकप्रियता और उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
कुड़ुख भाषा
कुड़ुख एक उत्तर द्रविड़ भाषा है जो मुख्य रूप से भारत के झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम राज्यों में ओरांव (कुड़ुख) और किसान समुदायों द्वारा बोली जाती है। इसके अलावा, इसके बोलने वाले बांग्लादेश, नेपाल और भूटान के कुछ हिस्सों में भी पाए जाते हैं। कुल मिलाकर, इस भाषा को बोलने वालों की संख्या लगभग 20 से 25 लाख है।
तोलोंग सिकि: एक विस्तृत अवलोकन
आविष्कार और विकास
तोलोंग सिकि का विकास गुमला जिले, झारखंड के एक डॉक्टर डॉ. नारायण उरांव द्वारा किया गया था। उन्होंने 1988-1989 के आसपास इस पर काम करना शुरू किया और 1999 में इसे प्रकाशित किया। इस कार्य में उन्हें सीआईआईएल मैसूर के पूर्व निदेशक फ्रांसिस एक्का, रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रामदयाल मुंडा और निर्मल मिंज जैसे विद्वानों का सहयोग मिला।
संरचना और उद्देश्य
• प्रकार: तोलोंग सिकि एक शुद्ध वर्णमाला लिपि है, जो ब्राह्मी से व्युत्पन्न अधिकांश भारतीय लिपियों के विपरीत, एक नियमित और ज्यामितीय डिजाइन वाली है। इसे बाएँ से दाएँ लिखा जाता है।
• उद्देश्य: इसे विशेष रूप से कुड़ुख की ध्वनि प्रणाली से पूरी तरह मेल खाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें इसकी स्वर प्रणाली, मूर्धन्य व्यंजन (retroflex consonants) और अन्य द्रविड़ विशेषताएँ शामिल हैं, जिन्हें देवनागरी में सटीक रूप से प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
• ध्वन्यात्मक संरचना: स्रोत के अनुसार, "कुंडूख भाषा के बोलचाल में लगभग 72 ध्वनियों का व्यवहार होता है। जिसे 41 मुख्य लिपि चिह्न एवं 6 सहायक चिह्न के योग से लिखा जा सकता है। इनमें से 36 व्यंजन ध्वनि (35 मूल व्यंजन तथा 1 व्यंजन अ ध्वनि) एवं 36 (मूल एवं संयुक्त) स्वर ध्वनि है।"
मान्यता और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ
• 2007: झारखंड सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई।
• 19 फरवरी 2009: झारखंड अधिविध परिषद, रांची द्वारा एक स्कूल को इस लिपि में मैट्रिक की परीक्षा लिखने की मान्यता दी गई।
• 28 अक्टूबर 2011: झारखंड सरकार के युवा, संस्कृति एवं खेल मंत्रालय द्वारा डॉ. नारायण उरांव सैन्दा को "तोलोंग सिकि" लिपि पर उनके शोध के लिए सांस्कृतिक सम्मान - 2011 प्रदान किया गया।
• 2018: तोलोंग सिकि पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म "लकीरें बोलती हैं" बनाई गई।
• 28 दिसंबर 2018: तोलोंग सिकि पर आधारित एक मोबाइल ऐप का लोकार्पण किया गया।
डिजिटल समर्थन और उपयोग
• कम्प्यूटरीकरण: इस लिपि का कम्प्यूटरीकरण हो चुका है। सॉफ्टवेयर डिजाइनर श्री किसलय जी ने 2002 में Kellytolong Font के नाम से इसका कंप्यूटर संस्करण विकसित किया, जिसे 2020 में अद्यतन किया गया। यह सॉफ्टवेयर निःशुल्क उपलब्ध है।
• यूनिकोड: इसे यूनिकोड संस्करण 17.0 में U+11DB0–U+11DEF रेंज में शामिल किया गया है, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसका उपयोग बहुत आसान हो गया है।
• उपयोग: इसका प्रचार कुड़ुख लिटरेरी सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा किया जाता है और इसका उपयोग किताबों, पत्रिकाओं, कविताओं, सांस्कृतिक सामग्रियों और कुछ आदिवासी/निजी स्कूलों में शिक्षण के लिए किया जाता है।
कुड़ुख बन्ना: एक विस्तृत अवलोकन
आविष्कार और विकास
कुड़ुख बन्ना (या कुरूख बाना) लिपि का आविष्कार ओडिशा के बासुदेव राम खलखो ने किया था। उन्होंने इसे 1991 में जारी करने से पहले लगभग 28 वर्षों तक इस पर काम किया।
संरचना और उद्देश्य
• प्रकार: यह एक आबुगिडा (अक्षरात्मक) लिपि है, जहाँ व्यंजनों में एक अंतर्निहित स्वर होता है और अन्य स्वरों को मात्राओं (diacritics) द्वारा दर्शाया जाता है। इसमें स्वर, व्यंजन और संयोजनों सहित लगभग 62 वर्ण हैं।
• उद्देश्य: इसे कुड़ुख की ध्वनियों और पहचान के लिए बेहतर रूप से अनुकूल बनाने के लिए बनाया गया था, ताकि देवनागरी की सीमाओं से बचा जा सके (जैसे अवांछित 'schwa' ध्वनि का संकेत)। इसे अधिक "मौलिक" और स्थान-कुशल भी माना जाता है। यह मूर्धन्य ध्वनियों और स्वर सामंजस्य (vowel harmony) को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
मान्यता और उपयोग
• भौगोलिक उपयोग: यह लिपि विशेष रूप से ओडिशा (मुख्य रूप से सुंदरगढ़ जिले) में लोकप्रिय है। इसका कुछ हद तक उपयोग छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम में भी ओरांव लोगों द्वारा किया जाता है।
• प्रचार: इसे कुड़ुख पड़हा (एक पारंपरिक ओरांव सामुदायिक संस्था) द्वारा पढ़ाया और बढ़ावा दिया जाता है।
• अनुप्रयोग: इसका उपयोग किताबों, पत्रिकाओं, शादी के कार्डों और दीवार चित्रों (जनजातीय कला के रूप में) में किया जाता है।
तोलोंग सिकि की बढ़ती लोकप्रियता के कारण
कुड़ुख बन्ना के पहले विकसित होने के बावजूद, तोलोंग सिकि ने हाल के वर्षों में अधिक प्रमुखता हासिल की है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. आधिकारिक मान्यता: झारखंड सरकार द्वारा 2007 में दी गई मान्यता ने इसे शिक्षा, परीक्षाओं और सांस्कृतिक प्रचार में एक औपचारिक दर्जा दिया है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड में कुड़ुख बोलने वालों की सबसे बड़ी आबादी है।
2. संस्थागत प्रचार: कुड़ुख लिटरेरी सोसाइटी ऑफ इंडिया जैसी राष्ट्रीय स्तर की संस्था द्वारा इसका सक्रिय रूप से प्रचार किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप इस लिपि में बड़ी संख्या में किताबें, पत्रिकाएँ और अन्य सामग्री प्रकाशित हुई हैं।
3. डिजिटल बढ़त: यूनिकोड में पूर्ण एन्कोडिंग ने इसे डिजिटल युग के लिए तैयार कर दिया है। केली तोलोंग (Kelly Tolong) और सिंगी दाई (Singi Dai) जैसे फॉन्ट की उपलब्धता और टाइपिंग सॉफ्टवेयर ने ऑनलाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी दृश्यता और अपनाने की दर को बढ़ा दिया है।
4. भौगोलिक पहुँच: यद्यपि इसका आधार झारखंड है, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे इसकी पहुँच अन्य राज्यों तक भी हो रही है।
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