हो भाषा और वारांग क्षिति लिपि का इतिहास
'हो' जनजाति, जो मुख्य रूप से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में केंद्रित है, एक ऑस्ट्रो-एशियाई मुंडा जातीय समूह है, जिसकी आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में 9 लाख से अधिक है। उनकी भाषा, जिसे 'हो' कहा जाता है, को पारंपरिक रूप से देवनागरी या लैटिन लिपियों में लिखा जाता था। 1950 के दशक में पंडित लाको बोदरा द्वारा 'वारांग क्षिति' लिपि का आविष्कार (या उनके विश्वास के अनुसार, पुनर्खोज) किया गया, जिसने हो समुदाय को एक अद्वितीय भाषाई पहचान प्रदान की।
1/26/20261 min read
'हो' जनजाति, जो मुख्य रूप से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में केंद्रित है, एक ऑस्ट्रो-एशियाई मुंडा जातीय समूह है, जिसकी आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में 9 लाख से अधिक है। उनकी भाषा, जिसे 'हो' कहा जाता है, को पारंपरिक रूप से देवनागरी या लैटिन लिपियों में लिखा जाता था। 1950 के दशक में पंडित लाको बोदरा द्वारा 'वारांग क्षिति' लिपि का आविष्कार (या उनके विश्वास के अनुसार, पुनर्खोज) किया गया, जिसने हो समुदाय को एक अद्वितीय भाषाई पहचान प्रदान की।
हो जनजाति: पृष्ठभूमि और जनसांख्यिकी
'हो' जनजाति भारत का एक ऑस्ट्रो-एशियाई मुंडा जातीय समूह है, जिन्हें झारखंड राज्य की अनुसूचित जनजातियों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
• उत्पत्ति और समूह: वे एक प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड समूह हैं। उनकी परंपरा के अनुसार, वे मुंडा परिवार का हिस्सा हैं और छोटानागपुर से कोल्हान क्षेत्र में आए थे।
• भौगोलिक एकाग्रता: वे मुख्य रूप से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र (पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां) और ओडिशा के कुछ हिस्सों में केंद्रित हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और छत्तीसगढ़ में भी उनकी कम आबादी पाई जाती है।
• जनसंख्या (2011 जनगणना):
◦ झारखंड में कुल जनसंख्या: 9,28,289
◦ झारखंड की कुल जनजातीय आबादी का प्रतिशत: 10.74%
◦ पश्चिमी सिंहभूम जिले में जनसंख्या: 8,16,556 (इस भाषा को बोलने वालों की सबसे सघन आबादी)
• नाम की उत्पत्ति: "हो" नाम उनकी भाषा के शब्द "होड़" से लिया गया है, जिसका अर्थ "इंसान" होता है।
• ऐतिहासिक संदर्भ: हो एक पारंपरिक योद्धा जनजाति हैं, जिन्होंने कोल्हान क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
हो भाषा और उसकी बोलियाँ
हो भाषा को ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं के खेरवारियन समूह के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है। इसकी तीन मुख्य बोलियाँ हैं:
1. लोहारा
2. चाईबासा
3. ठाकुरमुंडा
वारांग क्षिति के आविष्कार से पहले, हो भाषा को लिखने के लिए मुख्य रूप से देवनागरी और लैटिन लिपियों का उपयोग किया जाता था।
वारांग क्षिति लिपि: आविष्कार और इतिहास
आविष्कारक: पंडित लाको बोदरा
वारांग क्षिति लिपि का आविष्कार पंडित लाको बोदरा ने किया था। उनका मानना था कि यह लिपि प्राचीन काल में मौजूद थी, जिसे उन्होंने केवल फिर से खोजा और आधुनिक रूप दिया।
• जीवन परिचय:
◦ जन्म: 19 सितम्बर 1919, पसेया गाँव (सिंहभूम जिला)
◦ परिवार: पिता लेबेया बोदरा एक संपन्न किसान थे।
◦ कार्य: चाईबासा जिला स्कूल से मैट्रिक करने के बाद उन्होंने डंगुवापुसी स्थित रेलवे कार्यालय में लिपिक के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने लिपि का आविष्कार किया।
◦ राजनीतिक जीवन: उन्होंने 1957 में कांग्रेस और 1962 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में सिंहभूम लोकसभा से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार असफल रहे।
◦ निधन: 29 जून 1986, जमशेदपुर के एक अस्पताल में।
• आविष्कार की पृष्ठभूमि: लाको बोदरा का दृढ़ विश्वास था कि हो जनजाति की अपनी लिपि थी। अपने इस दावे के समर्थन में, उन्होंने मयूरभंज, केयोनझर (सीताबोंगा) और सिंहभूम (बेनीसागर) से प्राप्त शिलालेखों का उल्लेख किया, जो संभवतः ब्राह्मी लिपि में थे। उनके अनुसार, 13वीं सदी में 'तूरी' नामक एक हो तांत्रिक ने इस लिपि का आविष्कार किया था, लेकिन बाद में आक्रमणों और प्रवजन के कारण यह लुप्त हो गई।
लिपि का प्रचार-प्रसार और 'आदि समाज'
लाको बोदरा ने लिपि को लोकप्रिय बनाने के लिए संस्थागत प्रयास किए।
• आदि समाज की स्थापना: 1954 में, झिंकपानी सीमेंट कारखाना कॉलोनी में उन्होंने 'आदि समाज' नामक एक समिति की स्थापना की। इस समाज के सदस्यों ने वारांग क्षिति लिपि के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
• शैक्षिक पहल:
◦ उन्होंने लिपि सिखाने के लिए कक्षाएं शुरू कीं, जहाँ लगभग बीस लोग नियमित रूप से आते थे।
◦ लिपि में पाठ्य-पुस्तकें भी छापी गईं।
◦ 1956 में, चाईबासा के पास जोड़ापोखर गाँव में एक विद्यालय शुरू किया गया, जिसमें लगभग 500 छात्रों का नामांकन हुआ। यहाँ आवासीय सुविधा भी उपलब्ध थी और स्कूली विषयों के साथ-साथ हो भाषा की नई पाठ्य-पुस्तकें भी पढ़ाई जाती थीं।
◦ सभी शिक्षक हो जनजाति के थे और स्वैच्छिक रूप से काम करते थे।
◦ बाद में जगन्नाथपुर, मंझगाँव और जमशेदपुर में भी इसी तरह के विद्यालय खोले गए।
• विद्यालयों का बंद होना: वित्तीय और अन्य कठिनाइयों के कारण जोड़ापोखर का विद्यालय 1965 में बंद हो गया, और बाद में अन्य विद्यालय भी समाप्त हो गए। हालांकि, 'आदि समाज' आज भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सक्रिय है।
आधुनिक युग में महत्व और डिजिटल अनुकूलन
वारांग क्षिति लिपि ने आधुनिक तकनीक के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बिठाया है, जिससे इसका भविष्य सुरक्षित हुआ है।
• सांस्कृतिक पहचान: यह लिपि अब केवल लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि 'हो' आदिवासी पहचान और गौरव का एक शक्तिशाली प्रतीक है। इसने समुदाय को एक स्वतंत्र भाषाई पहचान दी है।
• शैक्षिक उपयोग: झारखंड के कई जिलों (सरायकेला-खरसावाँ, पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम) में प्राथमिक स्तर पर इस लिपि में पढ़ाई होती है। वयस्क साक्षरता कार्यक्रमों में भी इसका उपयोग बढ़ रहा है।
• साहित्यिक विकास: इस लिपि में "हो सागर" और "वारांग चिति" जैसी पत्रिकाएँ, किताबें, कहानियाँ और कविताएँ नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं।
तकनीकी प्रगति और डिजिटल उपस्थिति
1. यूनिकोड में शामिल होना (2014): 2014 में यूनिकोड संस्करण 7.0 में Warang Citi ब्लॉक (U+118A0–U+118FF) को जोड़ा गया। इससे कंप्यूटर, मोबाइल और वेबसाइटों पर इसका उपयोग वैश्विक स्तर पर संभव हो गया।
2. फ़ॉन्ट समर्थन: Google ने Noto Sans Warang Citi नामक एक निःशुल्क फ़ॉन्ट बनाया है, जो सभी प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम और ब्राउज़रों पर समर्थित है।
3. मोबाइल कीबोर्ड: Warang Citi Ho Keyboard जैसे ऐप्स Android के लिए उपलब्ध हैं, जिससे युवा पीढ़ी मोबाइल पर आसानी से अपनी भाषा में संवाद कर सकती है।
4. डिजिटल संरक्षण: सोशल मीडिया (Facebook, WhatsApp) पर समुदाय द्वारा इसका सक्रिय उपयोग भाषा को डिजिटल युग में जीवित रख रहा है। Aksharamukha जैसे ऑनलाइन लिप्यंतरण उपकरण भी इसे समर्थन देते हैं।
5. संवैधानिक मान्यता के प्रयास: हो भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कराने के प्रयासों में वारांग क्षिति लिपि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
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