महिलाओं के खिलाफ हिंसा एवं उन्मूलन के प्रयास
परिचय महिलाओं के खिलाफ हिंसा भारत ही नहीं, समूची दुनिया की एक जटिल और गहरी जड़ों वाली सामाजिक समस्या है। यह केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक, यौन, आर्थिक और डिजिटल सभी रूपों में महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को छीनती है। घर की चारदीवारी से लेकर कार्यस्थल, सार्वजनिक स्थान और अब डिजिटल दुनिया तक — हिंसा का दायरा लगातार बढ़ रहा है। भारत में पितृसत्तात्मक संरचना, दहेज प्रथा, लैंगिक असमानता और सामाजिक रूढ़ियों ने इस हिंसा को सदियों से पनपने का मौका दिया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि हर घंटे 51 से अधिक महिलाएँ अपराध की शिकार हो रही हैं, फिर भी यह केवल सामने आए मामलों की संख्या है — वास्तविकता इससे कहीं भयावह है क्योंकि अधिकांश मामले चुप्पी की दीवार में दबकर रह जाते हैं। हाल के वर्षों में साइबर स्पेस ने हिंसा के नए आयाम खोल दिए हैं — ऑनलाइन उत्पीड़न, रिवेंज पॉर्न, डीपफेक और समन्वित ट्रोलिंग ने महिलाओं के लिए डिजिटल दुनिया को भी असुरक्षित बना दिया है। यही कारण है कि वर्ष 2025 का वैश्विक थीम “सभी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ डिजिटल हिंसा को समाप्त करने के लिए एकजुट हों” रखा गया है। भारत सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए कानूनी सुधारों, तकनीकी हस्तक्षेपों और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से तेजी से कदम उठा रही है। मिशन शक्ति, वन स्टॉप सेंटर, भारतीय न्याय संहिता-2023, डिजिटल शक्ति अभियान और शी-बॉक्स जैसे प्रयास इस दिशा में मील के पत्थर साबित हो रहे हैं।
JPSC SPECIAL
11/29/20251 min read
वर्तमान स्थिति (2023–2025 तक के आँकड़े)
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2022 रिपोर्ट और 2023-24 के अनुमानों के अनुसार:
हर घंटे औसतन 51 FIR महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर्ज होती हैं।
वर्ष 2022 में कुल 4,45,256 मामले दर्ज (2021 से लगभग 12% वृद्धि)।
दहेज हत्या: 6,450 से अधिक मामले।
बलात्कार: 31,677 मामले (प्रतिदिन औसतन 87 बलात्कार)।
घरेलू हिंसा: कुल मामलों का 30–35% (सबसे बड़ा हिस्सा)।
एसिड अटैक: प्रतिवर्ष 150–200 मामले (बड़ी संख्या अंडर-रिपोर्टेड)।
साइबर हिंसा (ऑनलाइन उत्पीड़न, रिवेंज पॉर्न): 2023-24 में 50% से अधिक की वृद्धि।
राज्य-वार: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश सबसे ऊपर हैं। केरल तथा पूर्वोत्तर राज्यों में बेहतर रिपोर्टिंग के कारण आँकड़े अधिक दिखते हैं, जबकि बिहार-झारखंड में अंडर-रिपोर्टिंग गंभीर समस्या बनी हुई है।
हिंसा के प्रमुख कारण
पितृसत्तात्मक मानसिकता और पुरुष-प्रधान सोच
दहेज प्रथा एवं लालच
शिक्षा, रोजगार तथा संपत्ति में लैंगिक असमानता
शराब/नशा (घरेलू हिंसा के 40–50% मामलों में भूमिका)
कानून का कमजोर क्रियान्वयन और पुलिस की असंवेदनशीलता
“घर की बात” मानकर सामाजिक चुप्पी
जाति-धर्म आधारित हिंसा
महिलाओं की आर्थिक निर्भरता और बाहर निकलने का डर
हिंसा के प्रमुख प्रकार
घरेलू हिंसा: पति या ससुराल वालों द्वारा शारीरिक-मानसिक-आर्थिक उत्पीड़न (~1.3 लाख मामले)
दहेज हिंसा/हत्या: दहेज न मिलने पर प्रताड़ना व हत्या (6,450+ हत्याएँ)
बलात्कार एवं यौन हिंसा: जबरन यौन संबंध, गैंगरेप (31,677 मामले)
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न: छेड़छाड़, ब्लैकमेल (~5,000 शिकायतें)
एसिड अटैक: प्रेम/विवाह अस्वीकृति का बदला (150–200 मामले)
बाल विवाह से उत्पन्न वैवाहिक बलात्कार: कानूनन बलात्कार (23% लड़क Going 18 से पहले विवाह)
ऑनर किलिंग: प्रेम-विवाह या सामाजिक नियम तोड़ने पर हत्या (50–100 प्रतिवर्ष)
साइबर हिंसा: ट्रोलिंग, मोर्फ्ड फोटो, रिवेंज पॉर्न (तेजी से बढ़ रही)
ट्रैफिकिंग/जबरन देह व्यापार: (~8,000 मामले)
महिलाओं एवं समाज पर प्रभाव
व्यक्तिगत स्तर: गंभीर चोटें, स्थायी विकलांगता, मृत्यु, अनचाहा गर्भपात, HIV/STD, PTSD, डिप्रेशन, आत्महत्या की बढ़ती दर, नौकरी छोड़ना और इलाज का भारी खर्च।
पारिवारिक/सामाजिक स्तर: बच्चों में हिंसा का चक्र, कन्या भ्रूण हत्या से लैंगिक अनुपात में गिरावट, लड़कियों की शिक्षा-खेल-नौकरी पर रोक और समाज में भय का माहौल।
राष्ट्रीय स्तर: GDP का 2–4% नुकसान (WHO अनुमान), विश्व लैंगिक असमानता सूचकांक 2024 में भारत 129वाँ स्थान।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन के प्रमुख प्रयास
संस्थागत एवं कानूनी ढांचा
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW): जनवरी 1992 में स्थापित, महिलाओं के अधिकारों की निगरानी करने वाला शीर्ष वैधानिक निकाय। 24×7 हेल्पलाइन: 7827170170
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (1 जुलाई 2024 से प्रभावी): बलात्कार और नाबालिगों से दुष्कर्म के लिए आजीवन कारावास, पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005: शारीरिक, यौन, मौखिक, आर्थिक और दहेज उत्पीड़न को व्यापक परिभाषा
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH) अधिनियम, 2013: 10 से अधिक कर्मचारियों वाले हर कार्यस्थल पर आंतरिक समिति अनिवार्य
सरकारी योजनाएँ एवं सेवाएँ
मिशन शक्ति: महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण के लिए एकीकृत मिशन-मोड योजना
वन स्टॉप सेंटर: एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी, पुलिस सहायता, परामर्श और अस्थायी आश्रय
महिला हेल्पलाइन 181: 24×7 टोल-फ्री आपातकालीन सहायता
स्वाधार गृह: हिंसा, बेघरगी और ट्रैफिकिंग पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रय, भोजन, परामर्श और पुनर्वास
डिजिटल शक्ति अभियान: महिलाओं और लड़कियों को साइबर सुरक्षा एवं डिजिटल सशक्तिकरण
शी-बॉक्स पोर्टल: कार्यस्थल यौन उत्पीड़न की गोपनीय शिकायत और ट्रैकिंग के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म
आईटीएसएसओ (यौन अपराध जांच ट्रैकिंग सिस्टम): पुलिस जांच की रियल-टाइम निगरानी
फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें: बलात्कार और POCSO मामलों में तेज सुनवाई (773 अदालतें कार्यरत)
महिला सहायता डेस्क: देशभर के पुलिस स्टेशनों में संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए (14,658+ डेस्क)
इस वर्ष जब विश्व 25 नवम्बर को “सभी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ डिजिटल हिंसा को समाप्त करने के लिए एकजुट हों” जैसे सशक्त वैश्विक थीम के साथ महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन का अंतर्राष्ट्रीय दिवस मना रहा है, तब भारत लिंग-आधारित हिंसा के सभी रूपों—चाहे वह ऑफलाइन हो या ऑनलाइन—का मुकाबला करने के लिए अपने प्रयासों को और तेज कर रहा है।
मिशन शक्ति के अंतर्गत वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्प डेस्क और आपातकालीन हेल्पलाइन (181) के मजबूत नेटवर्क के जरिए, भारतीय न्याय संहिता-2023 जैसे ऐतिहासिक कानूनी सुधारों के साथ-साथ शी-बॉक्स, आईटीएसएसओ और डिजिटल शक्ति अभियान जैसे विशेष डिजिटल उपकरणों के माध्यम से भारत आसान शिकायत दर्ज करने, पीड़िता को त्वरित सहायता देने और तेज़-गति न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है।
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