ओल चिकी लिपि और संताली भाषा

संताली भाषा (ᱥᱟᱱᱛᱟᱲᱤ ᱯᱟᱹᱨᱥᱤ), जो भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदाय, संथाल लोगों द्वारा बोली जाती है, ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण भाषा है। सदियों तक मुख्य रूप से एक मौखिक भाषा रहने के बाद, इसे 20वीं सदी में अपनी लिपि, ओल चिकी (ᱚᱞ ᱪᱤᱠᱤ), मिली। 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु (गुरु गोमके) द्वारा आविष्कृत, ओल चिकी को विशेष रूप से संताली की अनूठी ध्वनियों, जैसे कि चेक्ड व्यंजन और ग्लोटल स्टॉप, को सटीक रूप से प्रस्तुत करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसे मौजूदा लिपियाँ (जैसे लैटिन, देवनागरी, या बांग्ला) करने में असमर्थ थीं।

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1/17/20261 min read

संताली भाषा (ᱥᱟᱱᱛᱟᱲᱤ ᱯᱟᱹᱨᱥᱤ), जो भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदाय, संथाल लोगों द्वारा बोली जाती है, ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण भाषा है। सदियों तक मुख्य रूप से एक मौखिक भाषा रहने के बाद, इसे 20वीं सदी में अपनी लिपि, ओल चिकी (ᱚᱞ ᱪᱤᱠᱤ), मिली। 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु (गुरु गोमके) द्वारा आविष्कृत, ओल चिकी को विशेष रूप से संताली की अनूठी ध्वनियों, जैसे कि चेक्ड व्यंजन और ग्लोटल स्टॉप, को सटीक रूप से प्रस्तुत करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसे मौजूदा लिपियाँ (जैसे लैटिन, देवनागरी, या बांग्ला) करने में असमर्थ थीं।

यह लिपि केवल एक लेखन प्रणाली से कहीं बढ़कर है; यह संथाल समुदाय के लिए सांस्कृतिक स्वायत्तता, जातीय गौरव और भाषाई न्याय का एक शक्तिशाली प्रतीक है। इसने सदियों पुरानी मौखिक परंपराओं, मिथकों और लोककथाओं के संरक्षण को सक्षम किया है, एक आधुनिक साहित्यिक परंपरा की नींव रखी, और मातृभाषा आधारित शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। 2003 में संताली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने में ओल चिकी की भूमिका महत्वपूर्ण थी। हाल की प्रमुख उपलब्धियों में 2025 में लिपि की 100वीं वर्षगांठ का उत्सव और भारत के राष्ट्रपति द्वारा ओल चिकी लिपि में संताली में अनुवादित भारतीय संविधान का विमोचन शामिल है, जो इसकी राष्ट्रीय प्रमुखता को रेखांकित करता है।

संताली भाषा: एक परिचय

संताली भारत की सबसे जीवंत जनजातीय भाषाओं में से एक है, जो देश के सबसे बड़े आदिवासी समुदाय, संथाल लोगों द्वारा बोली जाती है।

भाषा परिवार और वक्ता: यह ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित है, जो इसे भारत की प्रमुख इंडो-आर्यन (जैसे हिंदी, बंगाली) और द्रविड़ परिवारों से अलग करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 7.37 मिलियन वक्ताओं के साथ, और बांग्लादेश, नेपाल और भूटान में प्रवासी आबादी को मिलाकर, इसके कुल मूल वक्ताओं की संख्या 7 से 8 मिलियन से अधिक है। यह सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली मुंडा भाषा है।

भाषाई विशेषताएँ: संताली एक एग्ग्लूटिनेटिव व्याकरण की विशेषता रखती है। इसमें सजीव/निर्जीव लिंग, द्विवचन/बहुवचन संख्याएँ, और एक विषय-वस्तु-क्रिया वाक्य संरचना है।

आधिकारिक स्थिति: संताली को 2003 में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसे 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक का दर्जा मिला। यह झारखंड और पश्चिम बंगाल में एक आधिकारिक क्षेत्रीय भाषा है, और इसे ओडिशा, बिहार और असम में भी मान्यता प्राप्त है।

मौखिक परंपरा से लिखित रूप तक

हजारों वर्षों की मौखिक विरासत: सहस्राब्दियों तक, संताली मुख्य रूप से एक मौखिक भाषा थी। ज्ञान, मिथक (जैसे 'हिताल' में सृष्टि की कहानियाँ), कहावतें और महाकाव्य बहा और सोहराई जैसे त्योहारों के दौरान गीतों, नृत्यों और कहानी सुनाने के माध्यम से प्रसारित होते थे।

औपनिवेशिक काल और प्रारंभिक दस्तावेज़ीकरण: 19वीं शताब्दी के मध्य से ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों और ईसाई मिशनरियों (जैसे नॉर्वेजियन पॉल ओलाफ बोडिंग) ने लैटिन/रोमन लिपि में संताली का दस्तावेज़ीकरण करना शुरू किया। उन्होंने शब्दावलियाँ, व्याकरण, शब्दकोश और बाइबिल के अनुवाद तैयार किए।

अन्य लिपियों का उपयोग: क्षेत्रीय रूप से, भाषा को लिखने के लिए अन्य लिपियों को भी अपनाया गया, जिनमें बंगाल में बांग्ला, ओडिशा में ओडिया और बिहार/झारखंड में देवनागरी शामिल हैं। हालाँकि, इनमें से कोई भी लिपि संताली की अनूठी ध्वन्यात्मक विशेषताओं (जैसे ग्लोटल स्टॉप और चेक्ड व्यंजन) को सटीक रूप से पकड़ नहीं सकी।

ओल चिकी लिपि का आविष्कार और विकास

एक ऐसी लिपि की आवश्यकता जो संताली की ध्वनियों को सटीक रूप से दर्शा सके, 20वीं सदी की शुरुआत में सांस्कृतिक पुनरुद्धार का केंद्र बन गई।

पंडित रघुनाथ मुर्मु (गुरु गोमके) का योगदान: 1925 में, ओडिशा के मयूरभंज के दांदबोस में जन्मे 20 वर्षीय पंडित रघुनाथ मुर्मु (1905-1982) ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। उन्होंने संताली भाषा के लिए 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें उपन्यास, कविता, व्याकरण, नाटक और शब्दकोश शामिल हैं, जिससे एक साहित्यिक परंपरा की नींव पड़ी। लिपि को पहली बार 1939 में एक मयूरभंज राज्य प्रदर्शनी में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था और 1940 में इसे अंतिम रूप दिया गया।

नाम और प्रेरणा: 'ओल चिकी' नाम का संताली में अर्थ "लेखन प्रतीक" है (ओल = लेखन, चिकी = अक्षर/प्रतीक)। मुर्मु ने अक्षरों को चित्रात्मक और स्मरणीय आकृतियों के साथ डिज़ाइन किया जो संताली शब्दों से जुड़े थे। उदाहरण के लिए, /l/ ध्वनि के लिए अक्षर एक हाथ जैसा दिखता है जो लिख रहा है, क्योंकि "ओल" का अर्थ 'लिखना' है।

ओल चिकी का सांस्कृतिक और भाषाई महत्व

ओल चिकी लिपि संताली भाषा और संथाल (होर) समुदाय के लिए गहरा महत्व रखती है, जो इसे केवल एक लेखन प्रणाली से कहीं अधिक बनाती है।

1. ध्वन्यात्मक सटीकता: यह संताली की अनूठी ध्वनि प्रणाली, जैसे चेक्ड/ग्लोटलाइज़्ड व्यंजन (जैसे 'दक' - पानी) और विशिष्ट स्वरों का सटीक प्रतिनिधित्व करती है, जिससे लिखित भाषा स्पष्ट और स्वाभाविक हो जाती है।

2. सांस्कृतिक स्वायत्तता का प्रतीक: एक स्वदेशी लिपि होने के कारण, जो समुदाय के ही एक व्यक्ति द्वारा बनाई गई थी, इसने संथाल लोगों को सांस्कृतिक आत्मनिर्णय और गर्व की भावना दी, जिससे सांस्कृतिक विलय का प्रतिरोध हुआ।

3. मौखिक विरासत का संरक्षण: ओल चिकी ने मिथकों, गीतों, कहावतों और अनुष्ठानिक मंत्रों की विशाल मौखिक विरासत को लिखित रूप में दर्ज करने की अनुमति दी, जिससे इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा सके।

4. साहित्य और शिक्षा की नींव: लिपि ने एक आधुनिक साहित्यिक परंपरा के विकास को सक्षम किया है। यह स्कूलों और उच्च शिक्षा में मातृभाषा-आधारित शिक्षा का समर्थन करती है, जिससे आदिवासी बच्चों के लिए सीखने के परिणामों में सुधार होता है। दिसंबर 2013 में, UGC ने संताली को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) में एक विषय के रूप में पेश किया।

5. आधिकारिक मान्यता और राष्ट्रीय स्थिति: ओल चिकी का अस्तित्व और प्रचार 2003 में संताली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने में एक महत्वपूर्ण कारक था, जिससे इसे प्रमुख भारतीय भाषाओं के बराबर संवैधानिक दर्जा मिला।

6. डिजिटल युग में प्रासंगिकता: लिपि को यूनिकोड (2008 से), कंप्यूटर, मोबाइल कीबोर्ड और गूगल ट्रांसलेट जैसे उपकरणों के लिए सफलतापूर्वक अनुकूलित किया गया है। चल रही परियोजनाओं में एआई वाक् पहचान और टाइपिंग दक्षता में सुधार शामिल है, जो यह सुनिश्चित करता है कि भाषा डिजिटल युग में भी प्रासंगिक बनी रहे।

हाल की उपलब्धियाँ और भविष्य की दिशा

ओल चिकी और संताली भाषा ने 21वीं सदी में महत्वपूर्ण प्रगति करना जारी रखा है।

ओल चिकी का शताब्दी वर्ष (2025): 2025 में लिपि के आविष्कार की 100वीं वर्षगांठ मनाई गई। पूरे भारत में समारोह आयोजित किए गए, जिसमें जमशेदपुर में एक प्रमुख कार्यक्रम भी शामिल था, जिसकी अध्यक्षता भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने की।

संवैधानिक मील का पत्थर: 25 दिसंबर, 2025 को, राष्ट्रपति मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का उपयोग करके संताली में अनुवादित भारत के संविधान का विमोचन किया। यह भाषाई अधिकारों और स्वदेशी पहचान के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था।

डिजिटल प्रगति: गूगल ट्रांसलेट में संताली की उपलब्धता (टेक्स्ट-टू-स्पीच के साथ) और 2025 में 7 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी संताली विकिपीडिया भाषा की बढ़ती डिजिटल उपस्थिति को दर्शाती है।

संक्षेप में, ओल चिकी एक लेखन प्रणाली से कहीं बढ़कर है—यह भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक के लिए भाषाई न्याय, सांस्कृतिक पुनरुद्धार, आत्म-सम्मान और निरंतरता का एक शक्तिशाली साधन है। इसने संताली को एक मुख्य रूप से मौखिक भाषा से एक पूर्ण साक्षर, आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त और गर्व से आधुनिक भाषा में बदल दिया है।