संथाल हूल: विद्रोह के कारणों और नेतृत्व का एक व्यापक विश्लेषण

संथाल विद्रोह, जिसे 'संथाल हूल' के नाम से जाना जाता है, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह कई परस्पर जुड़े हुए उत्पीड़नों के विरुद्ध एक जटिल और सुनियोजित विद्रोह था। इसके मूल में कई प्रमुख कारण थे, जिनमें महाजनों और अंग्रेज नीलहों द्वारा किया जा रहा गंभीर आर्थिक शोषण, ब्रिटिश सरकार की दमनकारी भू-राजस्व नीतियां, और एक भ्रष्ट व दुर्गम न्यायिक-पुलिस प्रणाली शामिल थी। विद्रोह की चिंगारी तब भड़की जब अंग्रेज रेलवे ठेकेदारों द्वारा संथाल महिलाओं के सम्मान का हनन किया गया, जो संथाल समुदाय के लिए एक असहनीय अपराध था।

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12/27/20251 min read

संथाल विद्रोह, जिसे 'संथाल हूल' के नाम से जाना जाता है, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह कई परस्पर जुड़े हुए उत्पीड़नों के विरुद्ध एक जटिल और सुनियोजित विद्रोह था। इसके मूल में कई प्रमुख कारण थे, जिनमें महाजनों और अंग्रेज नीलहों द्वारा किया जा रहा गंभीर आर्थिक शोषण, ब्रिटिश सरकार की दमनकारी भू-राजस्व नीतियां, और एक भ्रष्ट व दुर्गम न्यायिक-पुलिस प्रणाली शामिल थी। विद्रोह की चिंगारी तब भड़की जब अंग्रेज रेलवे ठेकेदारों द्वारा संथाल महिलाओं के सम्मान का हनन किया गया, जो संथाल समुदाय के लिए एक असहनीय अपराध था।

विद्रोह का नेतृत्व मुख्य रूप से चार भाइयों - सिदो, कान्हू, चांद और भैरव ने किया, जिन्हें उनके देवता 'मारांग बुरु' से दिव्य आदेश प्राप्त होने का विश्वास था। इस आदेश में एक स्वतंत्र संथाल राज्य की स्थापना करने और अंग्रेजों, महाजनों, ठेकेदारों और उनके सभी सहयोगियों को देश से बाहर निकालने का आह्वान किया गया था। यह आंदोलन केवल संथालों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसमें लोहार, चमार, ग्वाला और तेली जैसी अन्य शोषित जातियों का भी व्यापक समर्थन शामिल था, जिसने इसे एक वर्गीय विद्रोह का स्वरूप प्रदान किया।

विद्रोह के प्रमुख कारण

संथाल हूल के पीछे कई गहरे और बहुआयामी कारण थे, जो ब्रिटिश शासन और उसके सहयोगियों द्वारा किए जा रहे सुनियोजित शोषण का परिणाम थे।

1. महाजनों और साहूकारों द्वारा आर्थिक शोषण

• शोषण का केंद्र: कई अंग्रेज इतिहासकारों ने संथाल विद्रोह का एकमात्र कारण महाजनों के अत्याचार को माना है। यद्यपि यह पूर्ण सत्य नहीं है, तथापि यह एक सर्वप्रमुख कारण अवश्य था। महाजनों ने संथालों को लूटा, उन पर भारी कर्ज लादा और उनके प्रति घोर असंतोष पैदा किया।

• बढ़ता आक्रोश: संथालों में महाजनों के प्रति इतना रोष था कि 30 जून, 1855 को हुए एक अधिवेशन में उन्हें खत्म कर देने का प्रस्ताव भी लाया गया, हालांकि यह प्रस्ताव बहुमत से गिर गया।

• मानव तस्करी में संलिप्तता: कुछ महाजन अंग्रेजों की मदद से संथालों को खरीदकर उन्हें दिनाजपुर के नील परगनों में भेज देते थे।

• निष्कर्ष: केवल महाजनों के जुल्म को विद्रोह का एकमात्र कारण मानना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि विद्रोह के कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी थे जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

2. दमनकारी भू-राजस्व नीति

• भूमि और स्वामित्व: संथालों ने जंगल साफ करके संथाल परगना में खेती योग्य भूमि तैयार की थी, जिसे वे अपनी मिल्कियत मानते थे।

• बढ़ता राजस्व: सरकार ने इन जमीनों पर मालगुजारी (भू-राजस्व) लगाना शुरू कर दिया, जो बहुत अधिक थी। यह राजस्व संग्रह तेजी से बढ़ा:

◦ सन 1838-39: ₹2,617

◦ सन 1854-55: ₹58,013

• अवैध वसूली: सरकार द्वारा नियुक्त किए गए तहसीलदार न केवल मालगुजारी वसूल करते थे, बल्कि अवैध ढंग से अवैध कर भी वसूलते थे, जिससे संथालों पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया।

3. भ्रष्ट न्यायिक और पुलिस प्रणाली

• न्याय की दुर्गमता: विद्रोह का एक अन्य प्रमुख कारण न्याय प्रणाली का महंगा और दुर्गम होना था। भागलपुर, वीरभूम और बर्दवान की कचहरियों तक पहुँचना संथालों के लिए अत्यंत कठिन था।

• पुलिस का अत्याचार: स्थानीय पुलिस थानों के दारोगा अत्याचारी थे और न्याय की गुहार लगाना लगभग असंभव था।

4. अंग्रेज नीलहों का अत्याचार

• नील की खेती: उन्नीसवीं सदी के मध्य में यूरोप में नील की भारी मांग थी, जिससे अंग्रेज नीलहों और किसानों दोनों को लाभ होता था। प्रारंभ में राजा राममोहन राय जैसे सुधारकों ने भी इसका समर्थन किया था।

• शोषण का चक्र: अंग्रेज नीलहों ने शुरू में संथालों को नील की खेती के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन जल्द ही उन्हें पता चला कि उनका भारी शोषण किया जा रहा है।

• अत्याचार का दस्तावेजीकरण: नीलहों द्वारा किए गए अत्याचारों की कहानियाँ उस समय के 'समाचार दर्पण' और अन्य पत्रिकाओं में श्री योगेशचंद्र बागला और श्री प्रसन्ना कुमार दत्त जैसे लेखकों द्वारा प्रकाशित की गईं।

• नील कोठियों की स्थापना: संथाल परगना के दुमका सब-डिवीजन, कोरैया, साहबगंज और राजमहल के इलाकों में बड़ी संख्या में नील की कोठियाँ स्थापित हो चुकी थीं।

5. तात्कालिक कारण: संथाल महिलाओं का अपमान

• घटना: विद्रोह की अंतिम चिंगारी राजमहल के पास रेलवे लाइन बना रहे अंग्रेज ठेकेदारों और साहबों द्वारा संथाल महिलाओं के शील हरण की घटना से लगी। संथाल अपने ऊपर हर तरह का अत्याचार सह सकते थे, लेकिन अपनी महिलाओं का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।

• समाचार रिपोर्ट: कलकत्ता के दैनिक पत्र 'संवाद प्रभाकर' ने संवत् 1912 (सन 1855) के श्रावण मास में यह समाचार प्रकाशित किया था। समाचार के अनुसार, राजमहल के पास रेलवे लाइन बनाने वाले साहबों ने तीन संथाल स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण कर लिया था।

• प्रतिशोध: इस घटना के जवाब में, बड़ी संख्या में संथाल इकट्ठा हुए और साहबों पर हमला कर दिया। उन्होंने सात साहबों को मारकर उन स्त्रियों को छुड़ा लिया। इस घटना ने विद्रोह की आग को पूरे क्षेत्र में फैला दिया।

विद्रोह का नेतृत्व और विचारधारा

संथाल हूल का नेतृत्व करिश्माई और दृढ़निश्चयी व्यक्तियों ने किया, जिनकी विचारधारा दिव्य प्रेरणा और सामाजिक न्याय की गहरी भावना से ओतप्रोत थी।

1. प्रमुख नेता

• सिदो, कान्हू, चांद और भैरव: विद्रोह का मुख्य नेतृत्व बछनाडीह के चुन्नू माँझी के चार पुत्रों - सिदो, कान्हू, चांद और भैरव - के हाथ में था। सिदो व्यक्तित्व में आकर्षक, छह फुट लम्बा और दृढ़ निश्चयी था।

• अन्य नेता: सन 1854 में ही बीर सिंह नामक एक नेता का उदय हुआ। इसके अतिरिक्त, संथाल परगना के लछिमनपुर के खेतिहर राजा बीर सिंह को 1854 में संथालों का राजा घोषित किया गया था। बीरभूम के राम ठाकुर जैसे नेताओं ने भी जन-आंदोलन को प्रेरणा दी।

2. दिव्य प्रेरणा और आदेश

• मारांग बुरु का दर्शन: संथाल जनजाति का मानना था कि उनके प्रमुख देवता 'मारांग बुरु' ने सिदो को दर्शन देकर विद्रोह का आदेश दिया था। देवता ने बैसाख की एक रात में सिदो को सात बार अलग-अलग रूपों में दर्शन दिए।

• ईश्वरीय आदेश: अंतिम दर्शन में, 'मारांग बुरु' ने सिदो को एक ग्रंथ दिया और कहा:

• देवी का दर्शन: सिदो को केवल 'मारांग बुरु' का ही नहीं, बल्कि एक देवी का भी दर्शन हुआ था, जिसने दूध के समान सफेद कपड़े पहने थे। उस देवी ने सिदो से कहा, "मैं तुमको सन्तालों का राजा नियुक्त करती हूँ। तुम जाकर सन्तालों के दुःख को दूर करो।"

3. विद्रोह की व्यापक प्रकृति

• सर्व-समावेशी आंदोलन: यह एक ভুল धारणा है कि यह जन-आंदोलन केवल संथालों का था। सिदो ने सभी शोषित वर्गों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

• अन्य जातियों का समर्थन: संथाल विद्रोह में लोहार, चमार, ग्वाला, तेली जैसी अन्य जातियों के लोगों ने भी सहयोग दिया था। सिदो ने लोहारों, कुम्हारों, डोमों और मोमिनों से संपर्क बनाए रखा।

• संगठित प्रयास: विद्रोह की गंभीरता का पता इस बात से चलता है कि संथालों ने 15 जुलाई, 1855 को एक घोषणा-पत्र तैयार किया था। यह घोषणा-पत्र संथाली भाषा में था, लेकिन इसकी लिपि हिंदी थी। यह दर्शाता है कि आंदोलन केवल एक भावनात्मक आवेग नहीं, बल्कि एक संगठित प्रयास था।