संताल हूल : भारत की पहली जनक्रांति
संथालो की अगुवाई में भागीदारी गैर संथालो की
INDEGENOUS
12/24/20251 min read
इतिहासकारों ने 1857 के ‘सिपाही विद्रोह’ को ही भारत की पहली आज़ादी की लड़ाई मान लिया है जबकि 1855-56 के संथालो की अगुवाई में हुए जनक्रांति को महज ‘संथाल हुल’ की संज्ञा देकर ही समेट दिया गया है। संथाल क्रांति का महत्व इस बात से पता चलती है की इसकी प्रत्येक घटना पर मार्क्स ने बारीकी से दृष्टि रखा वही दूसरी और ब्रिटेन के उस युग के सबसे प्रसिद्ध लेखक-चार्ल्स डिकेंस ने भी संथाल वीरों की प्रशंसा की। कार्ल मार्क्स ने नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री' में इसे भारत की "'जनक्रांति'" की संज्ञा दी है। "हाउसहोल्ड वर्ड्स" पत्रिका में 1856 में चार्ल्स डिकेंस ने रूसियों की जगह संथालों की प्रशंसा की।
वास्तव में यह यह एक ऐसा आंदोलन था जिसमे केवल संथाल ही नहीं बल्कि अन्य समुदाय के लोग भी शामिल थे। W W हंटर ने संथाल हूल के 12 वर्ष बाद प्रकाशित पुस्तक "द एनल्स ऑफ़ रूरल बंगाल" में लिखा है की "संथाल हुल में हिन्दुओ के बीच की कई अर्ध आदिवासी जातियां एवं खुद हिन्दुओ की सबसे निचली जातियां भी इस आंदोलन में शामिल थी। "
संथालो के नेता सिदो के नेतृत्व में लड़ी गई यह जनक्रांति संथालपरगना के लोगो की क्रांति थी। इसमें स्थानीय महाजनो , साहूकारों , मोमिनो ,लोहारो , चमारो , तेली , ग्वाला, डोम आदि सभी का योगदान रहा है।अंग्रेज इतिहासकारों ने संताल-विद्रोह का एकमात्र कारण महाजनों के अत्याचार को माना, यह तर्कसंगत नहीं है। यह सच है कि महाजनों ने संथालों को लूटा था, जिससे उनमें असंतोष था। संथाल संस्कार रुपरेखा पुस्तक जो 1966 में प्रकाशित हुई थी के अनुसार 30 जून 1855 को भोगनाडीह में सभी महाजनो को खत्म करने का प्रस्ताव लाया गया था मगर बहुमत से ख़ारिज हो गया था। विद्रोह केवल महाजनों के विरोध में नहीं था, बल्कि बहुत से महाजन संथालों के साथ थे। कुछ महाजन ऐसे भी थे जिन्होंने सिद्धू को कुंवर सिंह से संपर्क स्थापित करने में कोसिस में साथ दिया थी। कई महाजनो ने सिदो को धन देकर मदद की थी।
इससे पूर्व 1854 में भी संतालपरगना के गांव लछिमपुर के खेतौरी राजबीर सिंह ने संथालियों का संगठन बनाने का काम शुरू कर दिया था। उस दौरान रंगा ठाकुर, बीर सिंह मांझी, कोलाह परमानिक, डोमा मांझी जैसे नेता पूरे क्षेत्र में अलख जगा रहे थे।
भागलपुर के कमिश्नर ने 28 जुलाई, 1855 के अपने पत्र में लिखा कि संताल विद्रोह में लोहार, चमार, ग्वाला, तेली, डोम आदि समुदायों ने सिद्धू को सक्रिय सहयोग दिया था।
आदिवासी और गैर-आदिवासी किसान और कारीगर समूह भी इसमें शामिल थे। भुइयां एवं पहाड़ीया जनजातियों की भागीदारी एवं लोहार, कुम्हार, तेली, ग्वाला, नाइस, डोम जैसे कारीगर समूह आदि ने हुल को एक व्यापक आधार वाला चरित्र प्रदान कियाथा । मोमिन मुसलमान भी संताल सेना में बड़ी संख्या में शामिल थे। ग्वाला, लोहार और डोम् सबसे सक्रिय गैर-आदिवासी प्रतिभागी थे। बेचू राऊत, ग्वाला हुल के प्रमुख नेताओं में से एक था । महिलाएं भी हुल में भी प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने विद्रोहियों की सहायता की। कई महिलाएं गिरफ्तार कर हुई थी।
एक रिकॉर्ड अनुसार विद्रोह के बाद सजा पाने वालों की कुल संख्या 251 थी। वे 54 गांवों के निवासी थे। उनमें 191 संताल, 34 नापित, 5 डोम, 6 घांघर, 7 कोल, 6 भुइयां और एक रजवार था।
विद्रोह का मुख्य आधार संताल थे (लगभग 60,000 संतालों ने हिस्सा लिया), और लक्ष्य शोषक जमींदार, महाजन, ब्रिटिश को भगाना था। गैर-संतालों की भागीदारी मुख्यतः सहायक थी। वास्तव में यह यह विद्रोह 1857 की क्रांति से पहले का प्रमुख जन-आदिवासी विद्रोह है, जिसने संताल परगना को अलग जिला बनवाया और आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा के कानून (SPT Act, 1872 ) का आधार रखा।
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