झारखंड और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की पहली जिला-स्तरीय श्रम बाजार संकेतक रिपोर्ट
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने देश के इतिहास में पहली बार जिला-स्तरीय प्रमुख श्रम बाजार संकेतक 18 सितंबर 2026 को जारी किए हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा "लेबर मार्केट स्नैपशॉट ऑफ सिलेक्टेड डिस्ट्रिक्ट्स" (Labour Market Snapshot of Selected Districts) नाम से यह रिपोर्ट जारी की गई। इसके आधार पर आइये झारखंड का विश्लेषण करते है।
9/21/20261 min read
झारखंड के जिलों की स्तिथी
बेरोजगारी दर (UR) का विश्लेषण
सबसे अधिक बेरोजगारी वाले जिले:
बोकारो: 8.6% (राज्य में सबसे अधिक)
धनबाद: 8.0%
पूर्वी सिंहभूम: 4.3%
हजारीबाग: 3.7%
सबसे कम बेरोजगारी वाले जिले:
पलामू: 1.1% (राज्य में सबसे कम)
गिरिडीह: 2.5%
राज्य औसत के बराबर: राँची (2.7%) की बेरोजगारी दर ठीक राज्य के औसत (2.7%) के बराबर है।
पड़ोसी राज्यों से तुलना: झारखंड की बेरोजगारी दर (2.7%) उत्तर प्रदेश (2.7%) के बिल्कुल बराबर है। यह बिहार (3.8%), ओडिशा (2.9%) और पश्चिम बंगाल (2.8%) से बेहतर स्थिति में है, जबकि छत्तीसगढ़ (2.3%) में यह दर झारखंड से कम है।
श्रम बल भागीदारी (LFPR) और श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR)
शीर्ष प्रदर्शन करने वाले जिले (राज्य औसत 59.8% से ऊपर):
पश्चिमी सिंहभूम: LFPR 68.3% | WPR 67.1% (दोनों में राज्य में शीर्ष स्थान)
गढ़वा: LFPR 65.7% | WPR 65.5%
हजारीबाग: LFPR 64.8% | WPR 62.4%
पलामू: LFPR 64.1% | WPR 63.4%
गिरिडीह: LFPR 61.8% | WPR 60.2%
पिछड़े जिले (राज्य औसत से नीचे): धनबाद LFPR (50.8%) और WPR (46.7%) दोनों मामलों में सबसे निचले पायदान पर है। पूर्वी सिंहभूम (51.2%), देवघर (51.6%), बोकारो (54.3%) और राँची (55.6%) भी राज्य औसत से नीचे हैं।
NEET दर (शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में अनुपस्थित युवा: 15–29 वर्ष)
यह सूचकांक युवाओं की निष्क्रियता (demographic dividend के उपयोग) को दर्शाता है:
राष्ट्रीय स्तर पर राँची की उपलब्धि:
राँची देश के उन शीर्ष 5 जिलों में शामिल है जहाँ NEET दर सबसे कम है (16.5%)।
राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष 5 जिले: एर्नाकुलम (9.6%), कोयंबटूर (14.5%), बेंगलुरु शहरी (15.0%), राँची (16.5%), और सूरत (17.2%)।
राज्य के भीतर स्थिति:
सबसे बेहतर जिला: पश्चिमी सिंहभूम (10.4%), जहाँ युवा सबसे अधिक सक्रिय हैं। गढ़वा (14.9%), राँची (16.5%) और हजारीबाग (19.3%) भी राज्य औसत (21.0%) से बेहतर स्थिति में हैं।
सबसे खराब स्थिति: देवघर (32.4%) में NEET दर सबसे अधिक दर्ज की गई। इसके बाद धनबाद (32%), बोकारो (30%) और पूर्वी सिंहभूम (28.3%) का स्थान आता है।
प्रमुख संकेतक
LFPR (Labour Force Participation Rate / श्रम बल भागीदारी दर): यह कुल आबादी में काम कर रहे या सक्रिय रूप से रोजगार तलाश रहे लोगों का प्रतिशत है। उच्च LFPR दर्शाता है कि कार्यशील आयु वर्ग सक्रिय रूप से अर्थव्यवस्था में शामिल होने का इच्छुक है।
WPR (Worker Population Ratio / श्रमिक जनसंख्या अनुपात): कुल जनसंख्या में वास्तव में कार्यरत व्यक्तियों का अनुपात। यह रोजगार सृजन की वास्तविक क्षमता को दर्शाता है।
UR (Unemployment Rate / बेरोजगारी दर): कुल श्रम बल (LFPR) में से रोजगार न पाने वाले लोगों का अनुपात ( )।
NEET (Not in Education, Employment, or Training / 15-29 आयु वर्ग): युवाओं का वह हिस्सा जो न तो औपचारिक शिक्षा में है, न रोजगार में, और न ही किसी कौशल प्रशिक्षण में। यह जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के क्षरण और संभावित सामाजिक-आर्थिक असंतोष का सबसे संवेदनशील संकेतक है।
बेरोजगारी दर विश्लेषण
औद्योगिक जिलों में उच्च खुली बेरोजगारी (Open Unemployment):
बोकारो (8.6%) और धनबाद (8.0%) जैसे भारी उद्योग और खनन प्रधान जिलों में बेरोजगारी दर सबसे ऊंची है।
इसका मुख्य कारण यह है कि शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में शिक्षित एवं कुशल कार्यबल की संख्या अधिक होती है, जो विशिष्ट वेतन या योग्यता अनुसार औपचारिक नौकरियों की तलाश में रहते हैं और कम वेतन वाले या अनौपचारिक कार्यों को स्वीकार नहीं करते।
कृषि प्रधान/ग्रामीण क्षेत्रों में कम बेरोजगारी का विरोधाभास:
पलामू (1.1%) और गिरिडीह (2.5%) जैसे जिलों में बेरोजगारी दर सबसे कम दर्ज हुई है।
अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से यह स्थिति कम बेरोजगारी से अधिक प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) और निर्वाह कृषि/असंगठित क्षेत्र में संलग्नता को दर्शाती है, जहाँ लोग औपचारिक रोजगार न मिलने पर भी किसी न किसी छोटे-मोटे कार्य में जुड़े रहते हैं।
झारखंड की बेरोजगारी दर (2.7%) पड़ोसी राज्यों की तुलना में काफी संतुलित स्थिति में है.
श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) और श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) का विश्लेषण
ग्रामीण/पारंपरिक बनाम औद्योगिक विरोधाभास:
पश्चिमी सिंहभूम, गढ़वा और पलामू जैसे जिलों में LFPR और WPR 64% से 68% के बीच है। इन क्षेत्रों में कृषि, वनोपज और असंगठित कार्यों में परिवार के अधिकांश सदस्य (महिला व पुरुष दोनों) श्रम बल में भाग लेते हैं, जिसके कारण भागीदारी दर अधिक दिखती है।
इसके विपरीत, धनबाद (LFPR 50.8%, WPR 46.7%), पूर्वी सिंहभूम (LFPR 51.2%) और बोकारो (LFPR 54.3%) जैसे अत्यधिक शहरीकृत एवं औद्योगिक क्षेत्रों में दोनों दरें सबसे कम हैं।
LFPR और WPR के बीच का अंतर (रोजगार खाई):
धनबाद में LFPR 50.8% है जबकि WPR केवल 46.7% है (4.1% का अंतर), जो यह दर्शाता है कि श्रम बल में आने के बावजूद एक बड़ा हिस्सा रोजगार पाने में असमर्थ है।
गढ़वा (65.7% बनाम 65.5%) और पलामू (64.1% बनाम 63.4%) में LFPR और WPR लगभग बराबर हैं, यानी जो भी काम के लिए उपलब्ध है, वह किसी न किसी कार्य में लगा हुआ है।
रिपोर्ट में सामने आए ग्रामीण/पारंपरिक जिलों (जैसे पश्चिमी सिंहभूम, गढ़वा, पलामू) और औद्योगिक/शहरी जिलों (जैसे धनबाद, बोकारो, पूर्वी सिंहभूम) के बीच के विरोधाभास के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. आर्थिक संरचना और कार्य की प्रकृति
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्वाह गतिविधियाँ: पलामू, गढ़वा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे क्षेत्रों में आजीविका मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, वनोपज और असंगठित मजदूरी पर आधारित है। यहाँ काम का दायरा लचीला होता है, जिससे परिवार के अधिकांश सदस्य किसी न किसी छोटे-मोटे काम में संलग्न रहते हैं। इसी कारण यहाँ श्रम बल भागीदारी (LFPR) और श्रमिक अनुपात (WPR) ऊँचा दिखता है।
औद्योगिक क्षेत्रों में औपचारिक कार्यबल: बोकारो, धनबाद और पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) भारी उद्योग, खनन और विनिर्माण क्षेत्र हैं। यहाँ संगठित क्षेत्र में काम करने के लिए निश्चित योग्यता, कौशल और सीमित औपचारिक रिक्तियाँ होती हैं, जिससे सभी को तुरंत रोजगार नहीं मिल पाता।
2. प्रच्छन्न बेरोजगारी बनाम खुली/शिक्षित बेरोजगारी
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment): ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर (पलामू 1.1%, गिरिडीह 2.5%) कम दिखने का मतलब यह नहीं है कि सभी के पास गुणवत्तापूर्ण रोजगार है। वहाँ एक ही खेत या काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे रहते हैं। वे तकनीकी रूप से "बेरोजगार" नहीं गिने जाते, भले ही उनकी उत्पादकता कम हो।
शहरी क्षेत्रों में खुली बेरोजगारी (Open Unemployment): औद्योगिक जिलों (बोकारो 8.6%, धनबाद 8.0%) में शिक्षित युवा अपनी योग्यता के अनुसार वेतन और पद चाहते हैं। वे कम वेतन वाले या असंगठित कार्यों को स्वीकार नहीं करते और काम न मिलने पर खुद को सक्रिय रूप से 'काम की तलाश में' दर्ज कराते हैं, जिससे बेरोजगारी दर अधिक दर्ज होती है।
3. महिला श्रम बल भागीदारी (Female LFPR) का अंतर
ग्रामीण/जनजातीय क्षेत्रों में उच्च सहभागिता: पश्चिमी सिंहभूम (LFPR 68.3%) जैसे जनजातीय बहुल और कृषि प्रधान क्षेत्रों में महिलाएँ भी पुरुषों के साथ खेती, महुआ/वनोपज संग्रहण और स्थानीय कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।
शहरी/औद्योगिक क्षेत्रों में कम महिला भागीदारी: धनबाद (LFPR 50.8%) और बोकारो जैसे शहरी केंद्रों में परंपरागत रूप से महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी कम दर्ज होती है, क्योंकि वहाँ कार्यस्थल औपचारिक और घर से दूर होते हैं, जिससे समग्र LFPR नीचे आ जाता है।
4. उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण में समय व्यतीत करना
राँची, धनबाद और बोकारो जैसे प्रमुख केंद्रों में युवा वर्ग (15–29 वर्ष) उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या तकनीकी डिप्लोमा में समय बिताता है। इस दौरान वे प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते, जिससे इन जिलों का कुल LFPR और WPR ग्रामीण जिलों की तुलना में कम दर्ज होता है।
NEET दर में अंतर के प्रमुख कारण
1. बेहतर जिलों (राँची, पश्चिमी सिंहभूम) में कम NEET दर के कारण:
शैक्षणिक व कोचिंग हब (राँची): राँची राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों का मुख्य केंद्र है। यहाँ का अधिकांश युवा वर्ग औपचारिक शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण में नामांकित रहता है।
पारंपरिक व कृषि कार्यों में शीघ्र जुड़ाव (पश्चिमी सिंहभूम व गढ़वा): जनजातीय और ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवा 15 वर्ष की आयु के बाद से ही पारिवारिक आजीविका, वनोपज संग्रहण, हस्तशिल्प या स्थानीय कृषि कार्यों में सक्रिय हो जाते हैं। इसके चलते वे "रोजगार/कार्य" की श्रेणी में गिने जाते हैं और निष्क्रिय नहीं रहते।
पिछड़े जिलों (देवघर, धनबाद, बोकारो) में उच्च NEET दर (28%–32.4%) के कारण:
औपचारिक नौकरियों का संकट व भर्ती में सुस्ती: धनबाद और बोकारो भारी उद्योग (सेल, बीसीसीएल आदि) पर निर्भर रहे हैं। पिछले वर्षों में इन सार्वजनिक और बड़े उद्योगों में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की स्थायी भर्तियों में कमी आई है, जिससे पारंपरिक शिक्षा प्राप्त युवा बिना रोजगार के रह जाते हैं।
कौशल और बाजार की मांग में बेमेल (Skill Mismatch): पारंपरिक डिग्री (BA/B.Sc/B.Com) पूरी करने के बाद स्थानीय उद्योगों की तकनीकी मांग के अनुरूप कौशल न होने के कारण युवा नौकरी पाने में असमर्थ रहते हैं।
देवघर में सीमित औद्योगिक आधार: देवघर मुख्य रूप से धार्मिक पर्यटन और सेवा क्षेत्र पर आधारित अर्थव्यवस्था है। यहाँ बड़े विनिर्माण उद्योग या आईटी/कॉर्पोरेट क्षेत्र के सीमित होने के कारण युवाओं के लिए औपचारिक रोजगार के अवसर कम हैं, जिससे ड्रॉपआउट के बाद वे किसी प्रशिक्षण में नहीं जुड़ पाते।
युवाओं का 'वेटिंग पीरियड' (प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी): कई शहरी और अर्ध-शहरी युवा कॉलेज पूरा करने के बाद किसी औपचारिक प्रशिक्षण या नौकरी के बिना वर्षों तक घर पर रहकर सरकारी भर्तियों की तैयारी करते हैं। सांख्यिकीय दृष्टि से यदि वे किसी संस्थान में नामांकित नहीं हैं और कोई काम नहीं कर रहे, तो उन्हें NEET की श्रेणी में गिना जाता है।
© 2025. All rights reserved.
Contact Us
+919608166520
Ranchi
834001
