भारत के वन संसाधन
भारत के वन संसाधन: वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य (जीएफआरए 2025 के आधार पर) भारत की वन संपदा न केवल राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
11/20/20251 min read
भारत के वन संसाधन: वैश्विक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य (जीएफआरए 2025 के आधार पर)
भारत की वन संपदा न केवल राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है, बल्कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा जारी वैश्विक वन संसाधन आकलन (जीएफआरए) 2025 के अनुसार, भारत कुल वन क्षेत्रफल के मामले में विश्व में 9वें स्थान पर पहुँच गया है। यह आकलन आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ों पर आधारित एकमात्र विश्वव्यापी मूल्यांकन है, जो वनों की स्थिति, वृद्धि और कार्बन अवशोषण क्षमता को दर्शाता है। भारत शुद्ध वार्षिक वन क्षेत्र वृद्धि में तीसरे स्थान पर है और शीर्ष वैश्विक कार्बन सिंक में 5वें स्थान पर, जहाँ इसके वन 2021-2025 के दौरान प्रति वर्ष 150 मीट्रिक टन CO₂ हटाते हैं। यह नोट्स जीएफआरए 2025 की प्रमुख बातों, भारत की वन स्थिति, रोपित वनों की सफलता, कृषि वानिकी और सरकारी पहलों पर केंद्रित है, जो वनों के संरक्षण और विस्तार की दिशा में भारत की प्रगति को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु
1. वैश्विक वन स्थिति:
o कुल वैश्विक वन क्षेत्र: लगभग 4.14 बिलियन हेक्टेयर, जो पृथ्वी के भूमि क्षेत्र का ~32% है। प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र: लगभग 0.5 हेक्टेयर।
o शुद्ध वैश्विक वन हानि की वार्षिक दर: 1990-2000 में 10.7 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 2015-2025 में 4.12 मिलियन हेक्टेयर।
o क्षेत्रीय वितरण: यूरोप में सबसे बड़ा वन क्षेत्र (विश्व का 25%), दक्षिण अमेरिका में वनों का अनुपात सबसे अधिक (कुल भूमि का 49%)।
o शीर्ष देश: दुनिया के आधे से अधिक (54%) वन केवल पांच देशों में—रूसी संघ, ब्राज़ील, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन।
o कार्बन अवशोषण: वन भूमि प्रतिवर्ष 3.6 बिलियन टन CO₂ अवशोषित करती है।
2. भारत की वैश्विक स्थिति:
o कुल वन क्षेत्र: लगभग 72,739 हजार हेक्टेयर (विश्व के कुल क्षेत्रफल का ~2%)।
o रैंकिंग: कुल वन क्षेत्र में 9वां स्थान; शुद्ध वार्षिक वृद्धि में 3रा स्थान; कार्बन सिंक में 5वां स्थान (प्रति वर्ष 150 मीट्रिक टन CO₂ हटाव)।
o भारत वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023: कुल वन आवरण 7,15,343 वर्ग किमी (देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.76%)।
o शीर्ष राज्य: मध्य प्रदेश (77,073 वर्ग किमी), अरुणाचल प्रदेश (65,882 वर्ग किमी), छत्तीसगढ़ (55,812 वर्ग किमी)।
o मैंग्रोव आवरण: 4,992 वर्ग किमी (मुख्यतः अंडमान-निकोबार, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल)।
o संरक्षित क्षेत्र: 106 राष्ट्रीय उद्यान, 573 वन्यजीव अभयारण्य, 115 संरक्षण रिजर्व, 220 सामुदायिक रिजर्व।
3. रोपित वनों की सफलता:
o बाँस बागान: वैश्विक कुल 30.1 मिलियन हेक्टेयर; एशिया में 21.2 मिलियन हेक्टेयर (70%); भारत का हिस्सा 11.8 मिलियन हेक्टेयर। 1990-2025 के बीच वैश्विक वृद्धि 8.05 मिलियन हेक्टेयर (मुख्यतः चीन और भारत के कारण)।
o रबर बागान: वैश्विक कुल 10.9 मिलियन हेक्टेयर; भारत में 831 हजार हेक्टेयर (विश्व में 5वां स्थान)।
4. कृषि वानिकी:
o भारत और इंडोनेशिया मिलकर एशिया के कृषि वानिकी क्षेत्र का ~100% कवर करते हैं (कुल 39.3 मिलियन हेक्टेयर)।
o वैश्विक योगदान: दोनों देश मिलकर वैश्विक कृषि वानिकी का ~70% (55.4 मिलियन हेक्टेयर)।
5. सरकारी पहल:
o बजटीय आवंटन (2025-26): पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को ₹3,412.82 करोड़ (2024-25 के ₹3,125.96 करोड़ से 9% अधिक); राजस्व व्यय ₹3,276.82 करोड़ (96%, 8% वृद्धि)।
o राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (जीआईएम): फरवरी 2014 में शुरू; उद्देश्य—5 मिलियन हेक्टेयर वन/वृक्ष आवरण विस्तार और 5 मिलियन हेक्टेयर पर गुणवत्ता सुधार; जैव विविधता, जल, कार्बन भंडारण बढ़ाना; ~3 मिलियन वन-आश्रित परिवारों की आजीविका संवर्धन।
o राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम: क्षीण वनों का पुनर्जनन; त्रि-स्तरीय व्यवस्था—राज्य वन विकास एजेंसी (एसएफडीए), वन विकास एजेंसी (एफडीए), संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ (जेएफएमसी)।
o मिशन लाइफ: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा द्वारा सतत जीवनशैली पर प्रस्ताव; मेरिलाइफ पोर्टल—व्यक्तिगत/सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा; "एक पेड़ माँ के नाम" पहल—वृक्षारोपण को भावनात्मक रूप से प्रोत्साहित।
निष्कर्ष
जीएफआरए 2025 भारत की वन नीतियों की सफलता को रेखांकित करता है, जहाँ रोपित वन, कृषि वानिकी और सरकारी मिशनों जैसे जीआईएम व मिशन लाइफ ने वन क्षेत्र वृद्धि और कार्बन सिंक क्षमता को मजबूत किया है। हालांकि वैश्विक वन हानि अभी भी चुनौती है, भारत का 9वां स्थान और कार्बन अवशोषण में योगदान जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में महत्वपूर्ण है। आगे चलकर, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार और सामुदायिक भागीदारी से भारत न केवल राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, बल्कि वैश्विक पर्यावरण संतुलन में अग्रणी भूमिका निभाएगा। यह प्रगति सतत विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
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