गवई गोदरा पहाड़िया: स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने नायक

1765 में बंगाल पर कब्जा करने के बाद, अंग्रेजों ने संथाल परगना के राजमहल पहाड़ियों में बसे स्वतंत्रता प्रेमी पहाड़िया समुदाय को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की। लेकिन पहाड़िया लोग, जो अपनी आजादी के लिए जाने जाते थे, ने अंग्रेजी राज के खिलाफ हथियार उठा लिए। इस संघर्ष ने कई वीर पहाड़िया नायकों को जन्म दिया, जिनमें से एक थे

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11/29/20251 min read

1765 में बंगाल पर कब्जा करने के बाद, अंग्रेजों ने संथाल परगना के राजमहल पहाड़ियों में बसे स्वतंत्रता प्रेमी पहाड़िया समुदाय को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की। लेकिन पहाड़िया लोग, जो अपनी आजादी के लिए जाने जाते थे, ने अंग्रेजी राज के खिलाफ हथियार उठा लिए। इस संघर्ष ने कई वीर पहाड़िया नायकों को जन्म दिया, जिनमें से एक थे

गवई गोदरा पहाड़िया

वर्ष 1774 में, जब अंग्रेजों का दमन चरम पर था, संथाल परगना के सुंदरपहाड़ी क्षेत्र में पहाड़िया समुदाय ने छापामार युद्ध के जरिए अंग्रेजी शासन का विरोध किया। इस क्षेत्र की देखरेख भागलपुर के अंग्रेज मजिस्ट्रेट कैप्टन ब्रूक के हाथों में थी, जो पहाड़िया लोगों पर अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। पहाड़िया समुदाय को अंग्रेज अपने क्षेत्र में बिल्कुल पसंद नहीं करते थे और उन्हें दबाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे।

इस दमन के खिलाफ गवई गोदरा पहाड़िया ने विद्रोह का बिगुल फूंका। जब उन्हें सूचना मिली कि कैप्टन ब्रूक भागलपुर से सुंदरपहाड़ी के गढसिंगला होते हुए सिंहारसी जा रहे हैं, उन्होंने एक योजना बनाई। गवई गोदरा ने दो दिनों तक घात लगाकर कैप्टन ब्रूक का इंतजार किया। जैसे ही कैप्टन ब्रूक टटकपाड़ा गांव के पास पहुंचे, गवई गोदरा ने अपनी तलवार से उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस हमले में गवई गोदरा ने कैप्टन के बैज और बेल्ट का हुक भी नोंच लिया, जो उनके आक्रोश को दर्शाता है। कैप्टन की लाश को पास की पहाड़ी पर इमली के पेड़ के नीचे दफन कर दिया गया और पत्थरों से ढक दिया गया।

कैप्टन ब्रूक की हत्या की खबर फैलते ही अंग्रेजों में खलबली मच गई। उनका घोड़ा बिना सवार के भागलपुर पहुंचा, जिससे अंग्रेज अधिकारियों को शक हुआ। इसके बाद अंग्रेज सेना ने सुंदरपहाड़ी और गढसिंगला के आसपास के क्षेत्रों में पहाड़िया समुदाय पर भयानक अत्याचार शुरू कर दिए। गवई गोदरा की तलाश में जंगलों को छान मारा गया। अंततः, अंग्रेज सैनिकों ने गवई गोदरा को ढूंढ निकाला और उन्हें क्रूर यातनाएं दीं।

सुसनी के पास बोकड़ाबांध डाकबंगले के पास गवई गोदरा को फांसी पर लटका दिया गया। इस तरह एक और स्वतंत्रता प्रेमी अंग्रेजी दमन का शिकार बन गया। लेकिन उनकी वीरता और बलिदान ने पहाड़िया समुदाय में एक अमिट छाप छोड़ी।

गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी की पहाड़ियों में घने जंगलों के बीच बसा है टटकपाड़ा गांव। इस गांव में गवई गोदरा की सीमेंट की प्रतिमा स्थापित है, जो उनकी वीरता का प्रतीक है। पास ही एक छोटी-सी झोपड़ी है, जिसे उनकी धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है। हर साल, उनकी शहादत को याद करने के लिए इस गांव में मेला लगता है। पहाड़िया समुदाय के लोग उनकी तलवार की पूजा करते हैं, उसे जमीन में गाड़कर चारों ओर चक्कर लगाते हैं और पहाड़िया भाषा में लोकगीत गाकर उनकी वीरता का बखान करते हैं।

गोड्डा के शहीद स्तंभ परिसर में बने शहीद स्मारक में गवई गोदरा का नाम पत्थरों पर उकेरा गया है, जो उनके बलिदान को अमर बनाता है।

गवई गोदरा की वीरता और बलिदान के बावजूद, उन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिल सका, जो अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को मिला। उनके योगदान को मुख्यधारा के इतिहास में अक्सर नजरअंदाज किया गया है। लेकिन स्थानीय स्तर पर, खासकर पहाड़िया समुदाय में, उनकी कहानी आज भी जीवित है और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

गवई गोदरा पहाड़िया की कहानी न केवल संथाल परगना के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा है, बल्कि यह उन अनगिनत नायकों की कहानी भी है, जिन्होंने अपनी आजादी के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी वीरता और बलिदान हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी बड़ी होती है। आज जरूरत है कि गवई गोदरा जैसे नायकों को इतिहास में उचित स्थान दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें।