झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड: 25 वर्षों की ऐतिहासिक तुलना - झारखंड कहाँ खड़ा है?
झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड: 25 वर्षों की ऐतिहासिक तुलना - झारखंड कहाँ खड़ा है?
JPSC SPECIAL
11/15/20251 min read


झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड: 25 वर्षों की ऐतिहासिक तुलना - झारखंड कहाँ खड़ा है?
भारत के तीन युवा राज्य – झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड। ये तीनों राज्य 15 नवंबर झारखंड , 1 नवंबर 2000 छत्तीसगढ़ , उत्तराखंड 9 नवंबर को बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आए थे। 2025 में इनकी स्थापना को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह तुलना इन राज्यों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सफर पर केंद्रित है। खासतौर पर, हम देखेंगे कि खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड इस दौड़ में कहाँ खड़ा है। आइए, डेटा और तथ्यों के साथ इस ऐतिहासिक यात्रा को समझें।
स्थापना की पृष्ठभूमि: एक नई शुरुआत
2000 में इन राज्यों का गठन क्षेत्रीय विकास के लिए हुआ। झारखंड आदिवासी बहुल क्षेत्र था, जहाँ बिहार के पिछड़ेपन से त्रस्त लोग अलग राज्य चाहते थे। छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश के आदिवासी-कृषि इलाके से निकला, जबकि उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्रों की सांस्कृतिक और भौगोलिक अलगाव की मांग पर बना। इनकी स्थापना ने भारत के संघीय ढांचे को मजबूत किया, लेकिन विकास की राह में चुनौतियाँ भी लाईं।
आर्थिक विकास: उत्तराखंड का दबदबा, झारखंड की चुनौतियाँ
2000 में ये अर्थव्यवस्थाएँ छोटी थीं। 2023-24 तक उत्तराखंड की जीएसडीपी 14,501 करोड़ रुपये से बढ़कर 3.46 लाख करोड़ हो गई, यानी 21 गुना वृद्धि। छत्तीसगढ़ की जीएसडीपी 29,700 करोड़ से 5.05 लाख करोड़ (17 गुना), जबकि झारखंड की 35,460 करोड़ से 4.61 लाख करोड़ (13 गुना) रही। प्रति व्यक्ति आय के मामले में उत्तराखंड 18,000 रुपये (2000) से 2.60 लाख रुपये (2024) पहुँचा, छत्तीसगढ़ 12,170 से 1.85 लाख, लेकिन झारखंड मात्र 11,000 से 1.05 लाख पर अटका। झारखंड की खनन निर्भरता ने वृद्धि को सीमित रखा।
साक्षरता और शिक्षा: सुधार की दिशा में कदम
शिक्षा इन राज्यों की प्रगति का आईना है। 2001 में झारखंड की साक्षरता दर 54% थी, जो 2024 में बढ़कर 76.7% हो गई। उत्तराखंड 72% से 88%, छत्तीसगढ़ 65% से 78.5% पहुँचा। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में स्कूलों का विस्तार और डिजिटल शिक्षा ने मदद की, जबकि झारखंड में आदिवासी क्षेत्रों की दुर्गमता बाधा बनी। झारखंड में सुधार तेज है, लेकिन अभी भी सबसे पीछे।
मानव विकास सूचकांक (एचडीआई): असमान प्रगति
एचडीआई स्वास्थ्य, शिक्षा और आय को मापता है। 2019 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड का एचडीआई 0.612 है, छत्तीसगढ़ 0.591 और झारखंड 0.590। राष्ट्रीय औसत (0.645) से झारखंड सबसे दूर है। स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तराखंड के आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रमों ने फायदा पहुँचाया, जबकि झारखंड में कुपोषण और मलेरिया जैसी समस्याएँ बरकरार हैं।
बुनियादी ढांचा: सड़कें और हवाई अड्डे में निवेश
बुनियादी ढांचा विकास का आधार है। 2025 तक राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क बढ़ा है – उत्तराखंड में 4,000+ किमी, छत्तीसगढ़ में 5,000+ किमी और झारखंड में 3,500+ किमी। एक्सप्रेसवे जैसे दिल्ली-कटरा में उत्तराखंड को लाभ मिला, जबकि झारखंड में रांची-पटना कॉरिडोर निर्माणाधीन है। झारखंड में सड़क घनत्व कम है, लेकिन पीएम गति शक्ति योजना से सुधार हो रहा है।
राजनीतिक इतिहास: अस्थिरता की छाया
25 वर्षों में उत्तराखंड में 11 मुख्यमंत्री बदले, राजनीतिक अस्थिरता प्रमुख समस्या रही। झारखंड में आदिवासी राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोपों से 7+ सरकारें गिरीं। छत्तीसगढ़ अपेक्षाकृत स्थिर रहा, लेकिन नक्सलवाद ने प्रभावित किया। भ्रष्टाचार सूचकांक में झारखंड 28/28 पर सबसे नीचे है, जबकि उत्तराखंड 12वें स्थान पर।
जनसंख्या: वृद्धि की चुनौतियाँ
2001 जनगणना में उत्तराखंड की जनसंख्या 84.89 लाख थी, जो 2021 अनुमानित 114 लाख (34% वृद्धि) हो गई। छत्तीसगढ़ 207.95 लाख से 300 लाख (44%), झारखंड 269.46 लाख से 384.71 लाख (43%)। उत्तराखंड की जनसंख्या घनत्व कम है (पहाड़ी क्षेत्र), जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ में आदिवासी बहुलता से दबाव बढ़ा। झारखंड की युवा आबादी (60% 15-35 वर्ष) अवसर है, लेकिन प्रवासन रोकना चुनौती।
स्वास्थ्य: शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और आयु प्रत्याशा
2000 में स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर थीं। आईएमआर में उत्तराखंड 50 (प्रति 1000) से 27, छत्तीसगढ़ 80 से 40, झारखंड 70 से 27 पहुँचा। आयु प्रत्याशा में उत्तराखंड 65 से 72.5 वर्ष, छत्तीसगढ़ 60 से 66.5, झारखंड 62 से 67.5 वर्ष। आयुष्मान भारत ने मदद की, लेकिन कुपोषण झारखंड में बरकरार।
गरीबी दर: बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई)
2000 में सभी में 50%+ गरीबी थी। नीति आयोग के एमपीआई से उत्तराखंड में 35% से घटकर 9.37%, छत्तीसगढ़ 50% से 20.78%, झारखंड 55% से 28.81%। उत्तराखंड में पर्यटन ने गरीबी कम की।
वनावरण: पर्यावरण की पूंजी
ये राज्य वन-समृद्ध हैं। आईएसएफआर से 2001 में उत्तराखंड 45.4% था, जो 2023 में वही रहा। छत्तीसगढ़ 35.2% से 44.2% (+25%), झारखंड 29.6% से 33.5% (+13%)। झारखंड में खनन से हानि हुई।
पर्यटन: आगमन और राजस्व
उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन से चमका। 2000 में 10 लाख घरेलू पर्यटक आगमन से 2023 में 5,464 लाख (राजस्व 20,000+ करोड़)। छत्तीसगढ़ 5 लाख से 1,200 लाख (2,000 करोड़), झारखंड 3 लाख से 800 लाख (1,000 करोड़)। झारखंड-छत्तीसगढ़ में इको-टूरिज्म क्षमता बेकार पड़ी।
झारखंड पीछे क्यों? प्रमुख कारण
झारखंड का पिछड़ापन राजनीतिक, सुरक्षा एवं प्रबंधकीय कमजोरियों का परिणाम है। राजनीतिक अस्थिरता से 25 वर्षों में 7+ सरकारें बदलीं, भ्रष्टाचार ने निवेश रोका। नक्सलवाद ने 2016 में 22 जिलों को प्रभावित किया, 2025 तक 9 बचे, लेकिन ग्रामीण विकास बाधित। खनन प्रबंधन विफल: 28% कोयला उत्पादन, लेकिन अनियोजित खनन से हानि (40% जिले प्रभावित)। सामाजिक पूंजी की कमी से आदिवासी (26%) में असमानता बढ़ी, प्रवासन चरम पर। बुनियादी ढांचा कमजोर: सड़क घनत्व 57 किमी/100 वर्ग किमी, कृषि वृद्धि मात्र 2%।
झारखंड को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए
झारखंड 2030 तक 10 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रख सकता है। आर्थिक विकास के लिए सतत खनन नीति अपनाएँ, स्किल इंडिया मजबूत करें (5 लाख नौकरियाँ, 1,200 करोड़ केंद्र से)। शिक्षा-स्वास्थ्य में डिजिटल शिक्षा से साक्षरता 80% करें, आयुष्मान विस्तार। बुनियादी ढांचा: 1,000 किमी नई सड़कें, सौर ऊर्जा परियोजनाएँ। पर्यावरण: 35% वनावरण लक्ष्य, जल जीवन मिशन तेज। सामाजिक समावेश: पीईएसए कड़ाई से लागू, ई-गवर्नेंस से भ्रष्टाचार कम। खनन सुधार से 20% राजस्व वृद्धि (5,000 करोड़), पर्यटन निवेश से 10% जीएसडीपी योगदान (500 करोड़)।
आशा की किरण
25 वर्षों की तुलना से उत्तराखंड सबसे आगे, छत्तीसगढ़ मध्य और झारखंड पीछे है। लेकिन युवा आबादी और संसाधनों से उछाल संभव। स्थापना दिवस पर अपील: नीति-निर्माताओं और नागरिकों से सहयोग की जरूरत। झारखंड को 'धरती आबा' की सच्ची उत्तराधिकारी बनाना है। आपकी राय क्या है? कमेंट्स में बताएँ!
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